Fundamental Rights मूल अधिकारों

The Fundamental Rights are enshrined in Part III of the Constitution from Articles 12 to 35. In this regard, the framers of the Constitution derived inspiration from the Constitution of USA (i.e., Bill of Rights).

Part III of the Constitution is rightly described as the Magna Carta of India. It contains a very long and comprehensive list of ‘justiciable’

Fundamental Rights. In fact, the Fundamental Rights in our Constitution are more elaborate than those found in the Constitution of any other country in the world, including the USA.

The Fundamental Rights are guaranteed by the Constitution to all persons without any discrimination. They uphold the equality of all individuals, the dignity of the individual, the larger public interest and unity of the nation.

The Fundamental Rights are meant for promoting the ideal of political democracy. They prevent the establishment of an authoritarian and despotic rule in the country, and protect the liberties and freedoms of the people against the invasion by the State. They operate as limitations on the tyranny of the executive and arbitrary laws of the legislature. In short, they aim at establishing ‘a government of laws and not of men’.

The Fundamental Rights are named so because they are guaranteed and protected by the Constitution, which is the fundamental law of the land. They are ‘fundamental’ also in the sense that they are most essential for the all-round development (material, intellectual, moral and spiritual) of the individuals.

Originally, the Constitution provided for seven Fundamental Rights viz,

  1. Right to equality (Articles 14–18)
  2. Right to freedom (Articles 19–22)
  3. Right against exploitation (Articles 23–24)
  4. Right to freedom of religion (Articles 25–28)
  5. Cultural and educational rights (Articles 29–30)
  6. Right to property (Article 31)
  7. Right to constitutional remedies (Article 32)

However, the right to property was deleted from the list of Fundamental Rights by the 44th Amendment Act, 1978. It is made a legal right under Article 300-A in Part XII of the Constitution. So at present, there are only six Fundamental Rights.

संविधान के भाग 3 में अनुच्छेद 12 से 35 तक मूल अधिकारों का विवरण है। इस संबंध में संविधान निर्माता अमेरिकी संविधान (यानि अधिकार के विधेयक से) से प्रभावित रहे।

संविधान के भाग 3 को भारत का मैग्नाकार्टा” की संज्ञा दी गयी है, जो सर्वथा उचित है। इसमें एक लंबी एवं विस्तृत सूची में ‘न्यायोचित’ मूल अधिकारों का उल्लेख किया गया है। वास्तव में मूल अधिकारों के संबंध में जितना विस्तृत विवरण हमारे संविधान में प्राप्त होता है, उतना विश्व के किसी देश में नहीं मिलता; चाहे वह अमेरिका ही क्यों न हो।

संविधान द्वारा बिना किसी भेदभाव के हर व्यक्ति के लिए मूल अधिकारों के संबंध में गारंटी दी गई है। इनमें प्रत्येक व्यक्ति के लिए समानता, सम्मान, राष्ट्रहित और राष्ट्रीय एकता को समाहित किया गया है। मूल अधिकारों का तात्पर्य राजनीतिक लोकतंत्र के आदर्शों की उन्नति से है। ये अधिकार देश में व्यवस्था बनाए रखने एवं राज्य के कठोर नियमों के खिलाफ नागरिकों की आजादी की सुरक्षा करते हैं। ये विधानमंडल के कानून के क्रियान्वयन पर तानाशाही को मर्यादित करते हैं। संक्षेप में इनके प्रावधानों का उद्देश्य कानून की सरकार बनाना है न कि व्यक्तियों की।

मूल अधिकारों को यह नाम इसलिए दिया गया है, क्योंकि इन्हें संविधान द्वारा गारंटी एवं सुरक्षा प्रदान की गई है, जो राष्ट्र कानून का मूल सिद्धांत है। ये मूल’ इसलिए भी हैं क्योंकि ये व्यक्ति के चहुंमुखी विकास (भौतिक, बौद्धिक, नैतिक एवं आध्यात्मिक) के लिए आवश्यक हैं।

मूल रूप से संविधान ने सात मूल अधिकार प्रदान किए:

  1. समता का अधिकार (अनुच्छेद 14-18)।
  2. स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19-22)।
  3. शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23-24)।
  4. धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25-28)।
  5. संस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकार (अनुच्छेद 29-30)।
  6. संपत्ति का अधिकार (अनुच्छेद 31)।
  7. सांविधानिक उपचारों का अधिकार (अनुच्छेद 32)।

हालांकि, संपत्ति के अधिकार को 44वें संविधान अधिनियम, 1978 द्वारा मूल अधिकारों की सूची से हटा दिया गया है। इसे संविधान के भाग XII में अनुच्छेद 300-क के तहत कानूनी अधिकार बना दिया गया है। इस तरह फिलहाल छह मूल अधिकार है


The Fundamental Rights guaranteed by the Constitution are characterised by the following:

  1. Some of them are available only to the citizens while others are available to all persons whether citizens, foreigners or legal persons like corporations or companies.
  2. They are not absolute but qualified. The state can impose reasonable restrictions on them. However, whether such restrictions are reasonable or not is to be decided by the courts. Thus, they strike a balance between the rights of the individual and those of the society as a whole, between individual liberty and social control.
  3. All of them are available against the arbitrary action of the state. However, some of them are also available against the action of private individuals.
  4. Some of them are negative in character, that is, place limitations on the authority of the State, while others are positive in nature, conferring certain privileges on the persons.
  5. They are justiciable, allowing persons to move the courts for their enforcement, if and when they are violated.
  6. They are defended and guaranteed by the Supreme Court. Hence, the aggrieved person can directly go to the Supreme Court, not necessarily by way of appeal against the judgement of the high courts.
  7. They are not sacrosanct or permanent. The Parliament can curtail or repeal them but only by a constitutional amendment act and not by an ordinary act. Moreover, this can be done without affecting the ‘basic structure’ of the Constitution. (The amenability of fundamental rights is explained in detail in Chapter 11).
  8. They can be suspended during the operation of a National Emergency except the rights guaranteed by Articles 20 and 21. Further, the six rights guaranteed by Article 19 can be suspended only when emergency is declared on the grounds of war or external aggression (i.e., external emergency) and not on the ground of armed rebellion (i.e., internal emergency). (The suspension of fundamental rights during a national Emergency is explained in detail in Chapter 16).
  9. Their scope of operation is limited by Article 31A (saving of laws providing for acquisition of estates, etc.), Article 31B (validation of certain acts and regulations included in the 9th Schedule) and Article 31C (saving of laws giving effect to certain directive principles).
  10. Their application to the members of armed forces, para-military forces, police forces, intelligence agencies and analogous services can be restricted or abrogated by the Parliament (Article).
  11. Their application can be restricted while martial law is in force in any area. Martial law means ‘military rule’ imposed under abnormal circumstances to restore order (Article 34). It is different from the imposition of national emergency.
  12. Most of them are directly enforceable (self-executory) while a few of them can be enforced on the basis of a law made for giving effect to them. Such a law can be made only by the Parliament and not by state legislatures so that uniformity throughout the country is maintained (Article 35).

मूल अधिकारों की विशेषताएं मूल अधिकारों को संविधान में निम्नलिखित विशेषताओं के साथ सुनिश्चित किया गया है:

  1. उनमें से कुछ सिर्फ नागरिकों के लिए उपलब्ध हैं, जबकि कुछ अन्य सभी व्यक्तियों के लिए उपलब्ध हैं चाहे वे नागरिक, विदेशी लोगों या कानूनी व्यक्ति, जैसे-परिषद् एवं कंपनियां
  2. ये असीमित नहीं है, लेकिन वादयोग्य होते हैं। राज्य उन पर युक्तियुक्त प्रतिबंध लगा सकता है। हालांकि ये कारण उचित है या नहीं इसका निर्णय अदालत करती है। इस तरह ये व्यक्तिगत अधिकारों एवं पूरे समाज के बीच संतुलन कायम करते हैं। यह संतुलन व्यक्तिगत स्वतंत्रता एवं सामाजिक नियंत्रण के बीच होता है।
  3. कुछ मामलों को छोड़कर इनमें से ज्यादातर अधिकार राज्य के मनमाने रवैये के खिलाफ हैं, जैसे-राज्य के खिलाफ कोई कार्यवाही या व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई। जब अधिकार राज्य कार्यवाही के खिलाफ हों और किसी व्यक्ति द्वारा इसका उल्लंघन हो रहा हो, तो वे संवैधानिक उपाय नहीं, बल्कि व्यक्तिगत प्रतिकार हैं।
  4. इनमें से कुछ नकारात्मक विशेषताओं वाले होते हैं, जैसे राज्य के प्राधिकार को सीमित करने से संबंधित; जबकि कुछ सकारात्मक होते हैं, जैसे-व्यक्तियों के लिए विशेष सुविधाओं का प्रावधान।
  5. ये न्यायोचित हैं । ये व्यक्तियों को अदालत जाने की अनुमति देते हैं। जब भी इनका उल्लंघन होता है।
  6. इन्हें उच्चतम न्यायालय द्वारा गारंटी व सुरक्षा प्रदान की जाती है। हालांकि पीड़ित व्यक्ति सीधे उच्चतम न्यायालय जा सकता है। यह आवश्यक नहीं है कि केवल उच्च न्यायालय के खिलाफ ही वहां अपील को लेकर जाया जाये।
  7. ये स्थायी नहीं हैं। संसद इनमें कटौती या कमी कर सकती है लेकिन संशोधन अधिनियम के तहत, न कि साधारण विधेयक द्वारा। यह सब संविधान के मूल ढांचे को प्रभावित किए बिना किया जा सकता है (मूल अधिकारों के संशोधन को अध्याय 11 में विस्तार से वर्णित किया गया है)।
  8. राष्ट्रीय आपातकाल की सक्रियता के दौरान (अनुच्छेद 20 और 21 में प्रत्याभूत अधिकारों को छोड़कर) इन्हें निलंबित किया जा सकता है। अनुच्छेद 19 में उल्लिखित 6 मूल अधिकारों को तब स्थगित किया जा सकता है, जब युद्ध या विदेशी आक्रमण के आधार पर राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा की गई हो। इसे सशस्त्र विद्रोह (आंतरिक आपातकाल) के आधर पर स्थगित नहीं किया जा सकता। (राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान मूल अधिकारों का निलंबन अध्याय 16 में विस्तार से वर्णित किया गया है।)
  9. अनुच्छेद 31क (संपत्ति आदि के अधिग्रहण पर कानून की रक्षा) द्वारा इनके कार्यान्वयन की सीमाएं हैं। अनुच्छेद 31ख (कुछ अधिनियमों और विनियमों का विधि मान्यीकरण 9वीं सूची में शामिल किया गया) एवं अनुच्छेद 31ग (कुछ कुछ निदेशक तत्वों को प्रभावी करने वाली विधियों की व्यावृत्ति) आदि।
  10. सशस्त्र बलों, अर्द्ध सैनिक बलों, पुलिस बलों, गुप्तचर संस्थाओं और ऐसी ही सेवाओं से संबंधित सेवाओं के क्रियान्वयन पर संसद प्रतिबंध आरोपित कर सकती है (अनुच्छेद 33)।
  11. ऐसे इलाकों में भी इनका क्रियान्वयन रोका जा सकता है, जहां फौजी कानून प्रभावी हो। फौजी कानून का मतलब ‘सैन्य शासन’ से है, जो असामान्य परिस्थितियों में लगाया जाता है (अनुच्छेद 34)। यह राष्ट्रीय आपातकाल से भिन्न है।
  12. इनमें से ज्यादातर अधिकार स्वयं प्रवर्तित हैं, जबकि कुछ को कानून की मदद से प्रभावी बनाया जाता है। ऐसा कानून देश की एकता के लिये संसद द्वारा बनाया जाता है, न कि विधान मंडल द्वारा ताकि संपूर्ण देश में एकरूपता बनी रहे (अनुच्छेद 35)।


The term ‘State’ has been used in different provisions concerning the fundamental rights. Hence, Article 12 has defined the term for the purposes of Part III. According to it, the State includes the following:

  1. Government and Parliament of India, that is, executive and legislative organs of the Union government.
  2. Government and legislature of states, that is, executive and legislative organs of state government.
  3. All local authorities, that is, municipalities, panchayats, district boards, improvement trusts, etc.
  4. All other authorities, that is, statutory or non-statutory authorities like LIC, ONGC, SAIL, etc.

Thus, State has been defined in a wider sense so as to include all its agencies. It is the actions of these agencies that can be challenged in the courts as violating the Fundamental Rights.

According to the Supreme Court, even a private body or an agency working as an instrument of the State falls within the meaning of the ‘State’ under Article 12.

राज्य की परिभाषा

मूल अधिकारों से संबंधित विभिन्न उपबंधों में ‘राज्य’ शब्द का प्रयोग किया गया है। इस तरह इसे अनुच्छेद 12 में भाग-III के उद्देश्य के तहत परिभाषित किया गया है। इसके अनुसार राज्य में निम्नलिखित शामिल हैं:

(अ) कार्यकारी एवं विधायी अंगों को संघीय सरकार में क्रियान्वित करने वाली सरकार और भारत की संसद।

(ब) राज्य सरकार के विधायी अंगों को प्रभावी करने वाली सरकार और राज्य विधानमंडल।

(स) सभी स्थानीय निकाय अर्थात् नगरपालिकाएं, पंचायत, जिला बोर्ड सुधार न्यास आदि।

(द) अन्य सभी निकाय अर्थात् वैधानिक या गैर-संवैधानिक प्राधिकरण, जैसे-एलआईसी, ओएनजीसी, सेल आदि।

इस तरह राज्य को विस्तृत रूप में परिभाषित किया गया है। इसमें शामिल इकाइयों के कार्यों को अदालत में तब चुनौती दी जा सकती है, जब मूल अधिकारों का हनन हो रहा हो।

उच्चतम न्यायालय के अनुसार, किसी भी उस निजी इकाई अनुच्छेद 12 के तहत ‘राज्य’ के अर्थ में आती है।


Article 13 declares that all laws that are inconsistent with or in derogation of any of the fundamental rights shall be void. In other words, it expressively provides for the doctrine of judicial review. This power has been conferred on the Supreme Court (Article 32) and the high courts (Article 226) that can declare a law unconstitutional and invalid on the ground of contravention of any of the Fundamental Rights.

The term ‘law’ in Article 13 has been given a wide connotation so as to include the following:

  1. Permanent laws enacted by the Parliament or the state legislatures;
  2. Temporary laws like ordinances issued by the president or the state governors;
  3. Statutory instruments in the nature of delegated legislation (executive legislation) like order, bye-law, rule, regulation or notification; and
  4. Non-legislative sources of law, that is, custom or usage having the force of law.

Thus, not only a legislation but any of the above can be challenged in the courts as violating a Fundamental Right and hence, can be declared as void.

Further, Article 13 declares that a constitutional amendment is not a law and hence cannot be challenged. However, the Supreme Court held in the Kesavananda Bharati case (1973) that a Constitutional amendment can be challenged on the ground that it violates a fundamental right that forms a part of the ‘basic structure’ of the Constitution and hence, can be declared as void.

मूल अधिकारों से असंगत विधियां

अनुच्छेद 13 घोषित करता है कि मूल अधिकारों से असंगत या उनका अल्पीकरण करने वाली विधियां शून्य होंगी। दूसरे शब्दों में, ये न्यायिक समीक्षा योग्य हैं। यह शक्ति उच्चतम न्यायालय (अनुच्छेद 32) और उच्च न्यायालयों (अनुच्छेद 226) को प्राप्त है, जो किसी विधि को मूल अधिकारों का उल्लंघन होने के आधार पर गैर-संवैधानिक या अवैध घोषित कर सकते हैं।

अनुच्छेद 13 के अनुसार, ‘विधि’ शब्द को निम्नलिखित में शामिल कर व्यापक रूप दिया गया है:

  1. स्थायी विधियां, संसद या राज्य विधानमंडल द्वारा पारित।
  2. अस्थायी विधियां, जैसे-राज्यपालों या राष्ट्रपति द्वारा जारी अध्यादेश।
  3. प्रत्यायोजित विधान (कार्यपालिका विधान) की प्रकृति में सांविधानिक साधन जैसे-अध्यादेश, आदेश, उपविधि, नियम, विनियम या अधिसूचना।
  4. विधि के गैर-विधायी स्रोत, जैसे-विधि का बल रखने वाली रूढ़ि या प्रथा।

न केवल विधान बल्कि उपरोक्त में से किसी को अदालत में मूल अधिकारों के हनन पर चुनौती दी जा सकती है, अवैध घोषित किया जा सकता है।

इस तरह अनुच्छेद 13 घोषित करता है कि संविधान संशोधन कोई विधि नहीं है इसलिए उसे चुनौती नहीं दी जा सकती। यद्यपि उच्चतम न्यायालय ने केशवानंद भारती मामले (1973) में कहा कि मूल अधिकारों के हनन के आधार पर संविधान संशोधन को चुनौती दी जा सकती है। यदि वह संविधान के मूल ढांचे के खिलाफ हो तो उसे अवैध घोषित किया जा सकता है।

RIGHT TO EQUALITY समानता का अधिकार

1. Equality before Law and Equal Protection of Laws

Article 14 says that the State shall not deny to any person equality before the law or the equal protection of the laws within the territory of India. This provision confers rights on all persons whether citizens or foreigners. Moreover, the word ‘person’ includes legal persons, viz, statutory corporations, companies, registered societies or any other type of legal person.

The concept of ‘equality before law’ is of British origin while the concept of ‘equal protection of laws’ has been taken from the American Constitution. The first concept connotes: (a) the absence of any special privileges in favour of any person, (b) the equal subjection of all persons to the ordinary law of the land administered by ordinary law courts, and (c) no person (whether rich or poor, high or low, official or non-official) is above the law.

The second concept, on the other hand, connotes: (a) the equality of treatment under equal circumstances, both in the privileges conferred and liabilities imposed by the laws, (b) the similar application of the same laws to all persons who are similarly situated, and (c) the like should be treated alike without any discrimination. Thus, the former is a negative concept while the latter is a positive concept. However, both of them aim at establishing equality of legal status, opportunity and justice.

The Supreme Court held that where equals and unequals are treated differently, Article 14 does not apply. While Article 14 forbids class legislation, it permits reasonable classification of persons, objects and transactions by the law. But the classification should not be arbitrary, artificial or evasive. Rather, it should be based on an intelligible differential and substantial distinction.

Rule of Law The concept of ‘equality before law’ is an element of the concept of ‘Rule of Law’, propounded by A.V. Dicey, the British jurist. His concept has the following three elements or aspects:

    1. Absence of arbitrary power, that is, no man can be punished except for a breach of law.
    2. Equality before the law, that is, equal subjection of all citizens (rich or poor, high or low, official or non-official) to the ordinary law of the land administered by the ordinary law courts3 .
    3. The primacy of the rights of the individual, that is, the constitution is the result of the rights of the individual as defined and enforced by the courts of law rather than the constitution being the source of the individual rights.

The first and the second elements are applicable to the Indian System and not the third one. In the Indian System, the constitution is the source of the individual rights.

The Supreme Court held that the ‘Rule of Law’ as embodied in Article 14 is a ‘basic feature’ of the constitution. Hence, it cannot be destroyed even by an amendment.

Exceptions to Equality The rule of equality before law is not absolute and there are constitutional and other exceptions to it. These are mentioned below:

    1. The President of India and the Governor of States enjoy the following immunities (Article 361):
      1. The President or the Governor is not answerable to any court the exercise and performance of the powers and duties of office.
      2. No criminal proceedings shall be instituted or continued aga the President or the Governor in any court during his term office.
      3. No process for the arrest or imprisonment of the President or Governor shall be issued from any court during his term of offic
      4. No civil proceedings against the President or the Governor s be instituted during his term of office in any court in respect of act done by him in his personal capacity, whether before or a he entered upon his office, until the expiration of two months n after notice has been delivered to him.
    2. No person shall be liable to any civil or criminal proceedings in any court in respect of the publication in a newspaper (or by radio or television) of a substantially true report of any proceedings of either House of Parliament or either House of the Legislature of a State (Article 361-A).
    3. No member of Parliament shall be liable to any proceedings in any court in respect of anything said or any vote given by him in Parliament or any committee thereof (Article 105).
    4. No member of the Legislature of a state shall be liable to any proceedings in any court in respect of anything said or any vote given by him in the Legislature or any committee thereof (Article 194).
    5. Article 31-C is an exception to Article 14. It provides that the laws made by the state for implementing the Directive Principles contained in clause (b) or clause (c) of Article 39 cannot be challenged on the ground that they are violative of Article 14. The Supreme Court held that “where Article 31-C comes in, Article 14 goes out”.
    6. The foreign sovereigns (rulers), ambassadors and diplomats enjoy immunity from criminal and civil proceedings.
    7. The UNO and its agencies enjoy the diplomatic immunity.

1. विधि के समक्ष समता और विधियों का समान संरक्षण

अनुच्छेद 14 में कहा गया है कि राज्य भारत के राज्य क्षेत्र में किसी व्यक्ति को विधि के समक्ष समता से या विधियों के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा। प्रत्येक व्यक्ति चाहे वह नागरिक हो या विदेशी सब पर यह अधिकार लागू होता है। इसके अतिरिक्त व्यक्ति शब्द में विधिक व्यक्ति अर्थात् सांविधानिकनिगम, कपंनियां, पंजीकृत समितियां या किसी भी अन्य तरह का विधिक व्यक्ति सम्मिलित हैं।

‘विधि के समक्ष समता’ का विचार ब्रिटिश मूल का है, जबकि ‘विधियों के समान संरक्षण’ को अमेरिका के संविधान से लिया गया है। पहले संदर्भ में शामिल है-(अ) किसी व्यक्ति के पक्ष में विशिष्ट विशेषाधिकारों की अनुपस्थिति। (ब) साधारण विधि या साधारण विधि न्यायालय के तहत सभी व्यक्तियों के लिए समान व्यवहार । (स) कोई व्यक्ति (अमीर-गरीब, ऊंचा-नीचा, अधिकारी-गैर-अधिकारी) विधि के ऊपर नहीं है।

दूसरे संदर्भ में निहित है-(अ) विधियों द्वारा प्रदत्त विशेषाधिकारों और अध्यारोपित दायित्वों दोनों में समान परिस्थितियों के अंतर्गत व्यवहार समता, (ब) समान विधि के अंतर्गत सभी व्यक्तियों के लिए समान नियम हैं, और (स) बिना भेदभाव के समान के साथ समान व्यवहार होना चाहिए। इस तरह पहला नकारात्मक संदर्भ है, जबकि दूसरा सकारात्मक। हालांकि दोनों का उद्देश्य विधि, अवसर और न्याय की समानता है।

उच्चतम न्यायालय ने व्यवस्था दी कि जहां समान एवं असमान के बीच अलग-अलग व्यवहार होता हो, अनुच्छेद 14 लागू नहीं होता । यद्यपि अनुच्छेद 14 श्रेणी विधान को अस्वीकृत करता है। यह विधि द्वारा व्यक्तियों, वस्तुओं और लेन-देनों के तर्कसंगत वर्गीकरण को स्वीकृत करता है। लेकिन वर्गीकरण विवेक शून्य, बनावटी नहीं होना चाहिए। बल्कि विवेकपूर्ण,सशक्त और पृथक् होना चाहिए।

विधि का शासन

ब्रिटिश न्यायवादी ए.वी. डायसी का मानना है कि विधि के समक्ष समता’ का विचार विधि का शासन के सिद्धांत का मूल तत्व है। इस संबंध में उन्होंने निम्न तीन अवधारणायें प्रस्तुत की हैं:

  1. इच्छाधीन शक्तियों की अनुपस्थिति अर्थात् किसी भी व्यक्ति को विधि के उल्लंघन के सिवाए दण्डित नहीं किया जा सकता।
  2. विधि के समक्ष समता अत्यावश्यक है। कोई व्यक्ति (अमीर गरीब, ऊंचा-नीचा, अधिकारी-गैर-अधिकारी) कानून के ऊपर नहीं है।
  3. व्यक्तिगत अधिकारों की प्रमुखता अर्थात संविधान व्यक्तिगत अधिकारों का परिणाम है, जैसा कि न्यायालयों द्वारा इसे परिभाषित और लागू किया जाता है, नाकि संविधान व्यक्तिगत अधिकारों का स्रोत है।

पहले एवं दूसरे कारक ही भारतीय व्यवस्था में लागू हो सकते हैं, तीसरा नहीं। भारतीय व्यवस्था में संविधान ही भारत में व्यक्तिगत अधिकार का स्रोत है।

सर्वोच्च न्यायालय का मानना है कि अनुच्छेद 14 के अंतर्गत उल्लिखित विधि का शासन ही संविधान का मूलभूत तत्व है। इसलिये इसी किसी भी तरह, यहां तक कि संशोधन के द्वारा भी समाप्त नहीं किया जा सकता है।

समता के अपवाद

विधि के समक्ष समता का नियम, पूर्ण नहीं है तथा इसके लिये कई संवैधानिक निषेध एवं अन्य अपवाद हैं। इनका वर्णन इस प्रकार है:

  1. भारत के राष्ट्रपति एवं राज्यपालों को निम्न शक्तियां प्राप्त हैं (अनुच्छेद 361 के अंतर्गत):
    1. राष्ट्रपति या राज्यपाल अपने कार्यकाल में किये गये किसी कार्य या लिये गये किसी निर्णय के प्रति देश के किसी भी न्यायालय में जवाबदेह नहीं होंगे।
    2. राष्ट्रपति या राज्यपाल के विरुद्ध उसकी पदावधि के दौरान किसी न्यायालय में किसी भी प्रकार की दांडिक कार्यवाही प्रारंभ या चालू नहीं रखी जाएगी।
    3. राष्ट्रपति या राज्यपाल की पदावधि के दौरान उसकी गिरफ्तारी या कारावास के लिए किसी न्यायालय से कोई प्रक्रिया प्रारंभ नहीं की जा सकती।
    4. राष्ट्रपति या राज्यपाल पर उनके कार्यकाल के दौरान व्यक्तिगत सामर्थ्य से किये गये किसी कार्य के लिये किसी भी न्यायालय में दीवानी का मुकदमा नहीं चलाया जा सकता है। हां यदि इस प्रकार का कोई मुकदमा चलाया जाता है तो उन्हें इसकी सूचना देने के दो माह बाद ही ऐसा किया जा सकता है।
  2. कोई भी व्यक्ति यदि संसद के या राज्य विधान सभा के दोनों सदनों या दोनों सदनों में से किसी एक की सत्य कार्यवाही से संबंधित विषय-वस्तु का प्रकाशन समाचार-पत्र में (या रेडियो या टेलिविजन में ) करता है तो उस पर किसी भी प्रकार का दीवानी या फौजदारी का मुकदमा, देश के किसी भी न्यायालय में नहीं चलाया जा सकेगा (अनुच्छेद 361क)।
  3. संसद में या उसकी किसी समिति में संसद के किसी सदस्य द्वारा कही गई किसी बात या दिए गए किसी मत के संबंध में उसके विरुद्ध किसी न्यायालय में कोई कार्यवाही नहीं की जाएगी (अनुच्छेद 105)।
  4. राज्य के विधानमण्डल में या उसकी किसी समिति में विधानमण्डल के किसी सदस्य द्वारा कही गई किसी बात या दिए गए किसी मत के संबंध में उसके विरुद्ध न्यायालय में कोई कार्यवाही नहीं की जाएगी। (अनुच्छेद 194)
  5. अनुच्छेद 31-ग, अनुच्छेद-14 का अपवाद है। इसके अनुसार, किसी राज्य विधानमंडल द्वारा नीति निदेशक तत्वों के क्रियान्वयन के संबंध में यदि कोई नियम बनाया जाता है , जिसमें अनुच्छेद 39 की उपधारा (ख) या उपधारा (ग) का समावेश है तो उसे आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती कि वे अनुच्छेद-14 का उल्लंघन करते हैं। इस बारे में सर्वोच्च न्यायालय का कहना है कि जहां अनुच्छेद 31ग आता है, वहां से अनुच्छेद-14 चला जाता है’।
  6. विदेशी संप्रभु (शासक), राजदूत एवं कूटनीतिक व्यक्ति, दीवानी एवं फौजदारी मुकदमों से मुक्त होंगे।
  7. संयुक्त राष्ट्र संघ एवं इसकी एजेन्सियों को भी कूटनीतिक मुक्ति प्राप्त है।

2. Prohibition of Discrimination on Certain Grounds

Article 15 provides that the State shall not discriminate against any citizen on grounds only of religion, race, caste, sex or place of birth. The two crucial words in this provision are ‘discrimination’ and ‘only’. The word ‘discrimination’ means ‘to make an adverse distinction with regard to’ or ‘to distinguish unfavourably from others’. The use of the word ‘only’ connotes that discrimination on other grounds is not prohibited.

The second provision of Article 15 says that no citizen shall be subjected to any disability, liability, restriction or condition on grounds only of religion, race, caste, sex, or place of birth with regard to (a) access to shops, public restaurants, hotels and places of public entertainment; or (b) the use of wells, tanks, bathing ghats, road and places of public resort maintained wholly or partly by State funds or dedicated to the use of general public. This provision prohibits discrimination both by the State and private individuals, while the former provision prohibits discrimination only by the State.

There are four exceptions to this general rule of non-discrimination:

    1. The state is permitted to make any special provision for women and children. For example, reservation of seats for women in local bodies or provision of free education for children.
    2. The state is permitted to make any special provision for the advancement of any socially and educationally backward classes of citizens or for the scheduled castes and scheduled tribes. For example, reservation of seats or fee concessions in public educational institutions.
    3. The state is empowered to make any special provision for the advancement of any socially and educationally backward classes of citizens or for the scheduled castes or the scheduled tribes regarding their admission to educational institutions including private educational institutions, whether aided or unaided by the state, except the minority educational institutions.
    4. The state is empowered to make any special provision for the advancement of any economically weaker sections of citizens. Further, the state is allowed to make a provision for the reservation of upto 10% of seats for such sections in admission to educational institutions including private educational institutions, whether aided or unaided by the state, except the minority educational institutions. This reservation of upto 10% would be in addition to the existing reservations. For this purpose, the economically weaker sections would be notified by the state from time to time on the basis of family income and other indicators of economic disadvantage.

Reservation for OBCs in Educational Institutions

The above exception(c) was added by the 93rd Amendment Act of 2005. In order to give effect to this provision, the Centre enacted the Central Educational Institutions (Reservation in Admission) Act, 2006, providing a quota of 27% for candidates belonging to the Other Backward Classes (OBCs) in all central higher educational institutions including the Indian Institutes of Technology (IITs) and the Indian Institutes of Management (IIMs). In April 2008, the Supreme Court upheld the validity of both, the Amendment Act and the OBC Quota Act. But, the Court directed the central government to exclude the ‘creamy layer’ (advanced sections) among the OBCs while implementing the law.

The children of the following different categories of people belong to ‘creamy layer’ among OBCs and thus will not get the quota benefit :

    1. Persons holding constitutional posts like President, VicePresident, Judges of SC and HCs, Chairman and Members of UPSC and SPSCs, CEC, CAG and so on.
    2. Group ‘A’ / Class I and Group ‘B’ / Class II Officers of the All India, Central and State Services; and Employees holding equivalent posts in PSUs, Banks, Insurance Organisations, Universities etc., and also in private employment.
    3. Persons who are in the rank of colonel and above in the Army and equivalent posts in the Navy, the Air Force and the Paramilitary Forces.
    4. Professionals like doctors, lawyers, engineers, artists, authors, consultants and so on.
    5. Persons engaged in trade, business and industry.
    6. People holding agricultural land above a certain limit and vacant land or buildings in urban areas.
    7. Persons having gross annual income of more than ₹8 lakh or possessing wealth above the exemption limit. In 1993, when the “creamy layer” ceiling was introduced, it was ₹1 lakh. It was subsequently revised to ₹2.5 lakh in 2004, ₹4.5 lakh in 2008, ₹6 lakh in 2013 and ₹8 lakh in 2017.

Reservation for EWSs in Educational Institutions

The above exception (d) was added by the 103rd Amendment Act of 2019. In order to give effect to this provision, the central government issued an order (in 2019) providing 10% reservation to the Economically Weaker Sections (EWSs) in admission to educational institutions. The benefit of this reservation can be availed by the persons belonging to EWSs who are not covered under any of the existing schemes of reservations for SCs, STs and OBCs. The eligibility criteria laid down in this regard is as follows:

    1. Persons whose family has gross annual income below ₹8 lakh are to be identified as EWSs for the benefit of reservation. The income would include income from all sources i.e., salary, agriculture, business, profession etc. and it would be income for the financial year prior to the year of application.
    2. Persons whose family owns or possesses any one of the following assets are to be excluded from being identified as EWSs, irrespective of the family income:
      1. 5 acres of Agricultural land and above.
      2. Residential flat of 1000 sq.ft. and above.
      3. Residential plot of 100 sq.yards and above in notified municipalities.
    3. Residential plot of 200 sq.yards and above in areas otherthan the notified municipalities.
    4. The property held by a family in different locations or different places / cities would be clubbed while applying the land or property holding test to determine EWS status.
    5. Family for this purpose would include the person who seeks benefit of reservation, his/her parents and siblings below the age of 18 years as also his/ her spouse and children below the age of 18 years.

2. कुछ आधारों पर विभेद का प्रतिषेध

अनुच्छेद 15 मैं यह व्यवस्था दी गई है कि राज्य किसी नागरिक के प्रति केवल धर्म, मूल वंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान को लेकर विभेद नहीं करेगा। इसमें दो कठोर शब्दों की व्यवस्था है-‘विभेद’ और केवल’।’विभेद’ का अभिप्राय किसी के विरुद्ध विपरीत मामला या अन्य के प्रति उसके पक्ष में न रहना। केवल’ शब्द का अभिप्राय है कि अन्य आधारों पर मतभेद किया जा सकता है।

अनुच्छेद 15 की दूसरी व्यवस्था में कहा गया है कि कोई नागरिक केवल धर्म, मुल वंश, जाति. लिंग, जन्म स्थान या इनमें से किसी के आधर पर – (क) दुकानों, सार्वजनिक भोजनालयों, होटलों और सार्वजनिक मनोरंजन के स्थानों में प्रवेश; या (ख) पूर्णतः या भागतः राज्य-निधि से पोषित या साधारण जनता के प्रयोग के लिए समर्पित कुओं, तालाबों, स्नान घाटों, दायित्वों, निबंधन या शर्त के अधीन नहीं होगा। यह प्रावधान राज्य एवं व्यक्ति दोनों के विरुद्ध विभेद का प्रतिषेध करता है, जबकि पहले प्रावधान में केवल राज्य के विरुद्ध ही प्रतिषेध का वर्णन था।

विभेद से प्रतिषेध के इस सामान्य नियम के निम्न चार अपवाद हैं:

  1. राज्य को इस बात की अनुमति होती है कि वह बच्चों या महिलाओं के लिए विशेष व्यवस्था करे, उदाहरण के लिए स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए आरक्षण की व्यवस्था एवं बच्चों के लिए निःशुल्क शिक्षा की व्यवस्था शामिल है।
  2. राज्य को इसकी अनुमति होती है कि वह सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों या अनुसूचित जाति एवं जनजाति के विकास के लिए कोई विशेष उपबंध करे। उदाहरण के लिये, विधानमंडल में सीटों का आरक्षण या सार्वजनिक शैक्षणिक संस्थाओं में शुल्क से छूट शामिल हैं।
  3. राज्य को यह अधिकार है कि वह सामाजिक एवं शैक्षिक रूप से पिछडे. लोगों या अनुसूचित जाति या जनजाति के लोगों के उत्थान के लिये शैक्षणिक संस्थाओं में प्रवेश के लिये छूट संबंधी कोई नियम बना सकता है। ये शैक्षणिक संस्थान राज्य से अनुदान प्राप्त, निजी,अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को छोड़कर किसी भी प्रकार के हो सकते हैं।
  4. राज्य को नागरिकों के किसी भी आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग की उन्नति के लिए कोई विशेष प्रावधान करने का अधिकार है। इसके अलावा, राज्य को निजी शिक्षण संस्थानों सहित शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश के लिए इस तरह के वर्गों के लिए 10% तक आरक्षण का प्रावधान करने की अनुमति है, चाहे अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को छोड़कर, राज्य द्वारा सहायता प्राप्त या गैर-सहायता प्राप्त हों। 10% तक का यह आरक्षण मौजूदा आरक्षण के अतिरिक्त होगा। इस प्रयोजन के लिए, आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को राज्य द्वारा समय-समय पर परिवार की आय और आर्थिक नुकसान के अन्य संकेतकों के आधार पर अधिसूचित किया जाएगा।

शैक्षिक संस्थानों में ओबीसी के लिए आरक्षण

उपरोक्त अपवाद (c) को 2005 के 93 वें संशोधन अधिनियम द्वारा जोड़ा गया था। इस प्रावधान को प्रभावी करने के लिए, केंद्र ने केंद्रीय शैक्षिक संस्थानों (प्रवेश में आरक्षण) अधिनियम, 2006 को लागू किया, जिसमें संबंधित उम्मीदवारों को 27% का कोटा प्रदान किया गया था। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (IITs) और भारतीय प्रबंधन संस्थानों (IIMs) सहित सभी केंद्रीय उच्च शिक्षण संस्थानों में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को अप्रैल 2008 में, सुप्रीम कोर्ट ने संशोधन अधिनियम और ओबीसी कोटा अधिनियम दोनों की वैधता को बरकरार रखा। लेकिन, न्यायालय ने केंद्र सरकार को कानून लागू करते समय ओबीसी के बीच क्रीमी लेयर ’(उन्नत वर्गों) को बाहर करने का निर्देश दिया।

  1. संवैधानिक पद धारण करने वाले व्यक्ति, जैसे कि राष्ट्रपति उप-राष्ट्रपति, उच्चतम एवं उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश, संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्य, राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्य, मुख्य निर्वाचन आयुक्त, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक आदि।
  2. वर्ग ए या ग्रुपए तथा ग्रुप बी की सेवा के क्लास II अधिकारी, जो कि केंद्रीय या राज्य सेवाओं में हैं। इसके अलावा सार्वजनिक प्रतिष्ठानों, बैंकों, बीमा कंपनियों, विश्वविद्यालयों आदि में पदस्थ समकक्ष अधिकारी आदि। यह नियम निजी कंपनियों में कार्यरत अधिकारियों पर भी लागू होता है।
  3. सैना में कर्नल या उससे ऊपर के रैंक का अधिकारी या नौसेना, वायु सेना एवं अर्द्ध-सैनिक बलों में समान रैंक का अधिकारी।
  4. डॉक्टर, अधिवक्ता, इंजीनियर, कलाकार, लेखक, सलाहकार आदि प्रकार के पेशेवर।
  5. व्यापार, वाणिज्य एवं उद्योग में लगे व्यक्ति।
  6. शहरी क्षेत्रों में जिन लोगों के पास भवन हैं तथा जिनके पास एक निश्चित सीमा से अधिक की कृषि भूमि या रिक्त भूमि रखने वाले।
  7. जिन लोगों की सालाना आय 4.5 लाख से अधिक है या जिनके पास एक छूट सीमा से अधिक की संपत्ति है। 1993 में जबकि ‘मलाईदार परत (creamy layer)’ हदबंदी लागू की गई, यह 1 लाख थी। बाद में 2004 में इसे बढ़ाकर 2.5 लाख, 2008 में 4.5 लाख 2013 में 6 लाख तथा 2017 में 8 लाख रुपये  किया गया।

शैक्षिक संस्थानों में ईडब्ल्यूएस के लिए आरक्षण

उपरोक्त अपवाद (d) को 2019 के 103 वें संशोधन अधिनियम द्वारा जोड़ा गया था। इस प्रावधान को प्रभावी करने के लिए, केंद्र सरकार ने एक आदेश जारी किया (2019 में) आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (ईडब्ल्यूएस) को प्रवेश में 10% आरक्षण प्रदान करना। शिक्षण संस्थान। इस आरक्षण का लाभ ईडब्ल्यूएस से संबंधित व्यक्तियों द्वारा लिया जा सकता है जो अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण की मौजूदा योजनाओं में शामिल नहीं हैं। इस संबंध में निर्धारित पात्रता मानदंड निम्नानुसार हैं:

  1. जिन व्यक्तियों के परिवार की सकल वार्षिक आय 8 लाख से कम है, उन्हें आरक्षण के लाभ के लिए ईडब्ल्यूएस के रूप में पहचाना जाना चाहिए। आय में सभी स्रोतों यानी वेतन, कृषि, व्यवसाय, पेशे आदि से आय शामिल होगी और यह आवेदन के वर्ष से पहले वित्तीय वर्ष के लिए आय होगी।
  2. जिन व्यक्तियों का परिवार निम्नलिखित संपत्ति में से किसी एक का मालिक है या उनके पास है, उन्हें ईडब्ल्यूएस के रूप में पहचाने जाने से रोक दिया जाता है, भले ही वह परिवार की आय के बावजूद हो:
    1. 5 एकड़ कृषि भूमि और ऊपर।
    2. 1000 वर्ग फुट का आवासीय फ्लैटऔर ऊपर।
    3. अधिसूचित नगरपालिकाओं में 100 वर्ग गज और उससे अधिक का आवासीय भूखंड।
  3. अधिसूचित नगरपालिकाओं के अन्य क्षेत्रों में 200 वर्गमीटर और उससे अधिक के आवासीय भूखंड।
  4. विभिन्न स्थानों या अलग-अलग स्थानों / शहरों में एक परिवार द्वारा आयोजित संपत्ति को ईडब्ल्यूएस स्थिति निर्धारित करने के लिए भूमि या संपत्ति होल्डिंग टेस्ट लागू करते समय क्लब किया जाएगा।
  5. इस प्रयोजन के लिए परिवार में वह व्यक्ति शामिल होगा जो 18 वर्ष से कम आयु के आरक्षण का लाभ, अपने माता-पिता और भाई-बहनों के साथ-साथ अपने पति / पत्नी और 18 वर्ष से कम आयु के बच्चों को भी शामिल करेगा।

3. Equality of Opportunity in Public Employment

Article 16 provides for equality of opportunity for all citizens in matters of employment or appointment to any office under the State. No citizen can be discriminated against or be ineligible for any employment or office under the State on grounds of only religion, race, caste, sex, descent, place of birth or residence.

There are four exceptions to this general rule of equality of opportunity in public employment:

    1. Parliament can prescribe residence as a condition for certain employment or appointment in a state or union territory or local authority or other authority. As the Public Employment (Requirement as to Residence) Act of 1957 expired in 1974, there is no such provision for any state except Andhra Pradesh and Telangana.
    2. The State can provide for reservation of appointments or posts in favour of any backward class that is not adequately represented in the state services.
    3. A law can provide that the incumbent of an office related to religious or denominational institution or a member of its governing body should belong to the particular religion or denomination.
    4. The state is permitted to make a provision for the reservation of upto 10% of appointments or posts in favour of any economically weaker sections of citizens. This reservation of upto 10% would be in addition to the existing reservation. For this purpose, the economically weaker sections would be notified by the state from time to time on the basis of family income and other indicators of economic disadvantage.

3. लोक नियोजन के विषय में अवसर की समता

अनुच्छेद 16 में राज्य के अधीन किसी पद पर नियोजन या नियुक्ति से संबंधित विषयों में सभी नागरिकों के लिए अवसर की समता होगी। किसी भी नागरिक के साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता या केवल धर्म, वंश, जाति, लिंग, जन्म का स्थान, या निवास के स्थान के आधार पर राज्य के किसी भी रोजगार एवं कार्यालय के लिए अयोग्य नहीं ठहराया जाएगा।

लोक नियोजन के विषय में अवसर की समता के साधारण नियम में तीन अपवाद हैं:

  1. संसद किसी विशेष रोजगार के लिए निवास की शर्त आरोपित कर सकती है। जैसा कि सार्वजनिक रोजगार (जिसमें निवास की जरूरत हो) अधिनियम 1957 कुछ वर्ष बाद 1974 में समाप्त हो गया। इस समय आंध्र प्रदेश एवं तेलंगाना के अतिरिक्त किसी अन्य राज्य में यह व्यवस्था नहीं है।
  2. राज्य नियुक्तियों के आरक्षण की व्यवस्था कर सकता है या किसी पद को पिछड़े वर्ग के पक्ष में बना सकता है जिनका कि राज्य में समान प्रतिनिधित्व नहीं है।
  3. विधि के तहत किसी संस्था या इसके कार्यकारी परिषद के सदस्य या किसी की धार्मिक आधार पर व्यवस्था की जा सकती है।
  4. राज्य को नागरिकों के किसी भी आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के पक्ष में 10% नियुक्तियों या पदों के आरक्षण का प्रावधान करने की अनुमति है। 10% तक का यह आरक्षण मौजूदा आरक्षण के अतिरिक्त होगा। इस प्रयोजन के लिए, आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को राज्य द्वारा समय-समय पर परिवार की आय और आर्थिक नुकसान के अन्य संकेतकों के आधार पर अधिसूचित किया जाएगा।

Mandal Commission and Aftermath

In 1979, the Morarji Desai Government appointed the Second Backward Classes Commission under the chairmanship of B.P. Mandal, a Member of Parliament, in terms of Article 340 of the Constitution to investigate the conditions of the socially and educationally backward classes and suggest measures for their advancement. The commission submitted its report in 1980 and identified as many as 3743 castes as socially and educationally backward classes. They constitute nearly 52% component of the population, excluding the scheduled castes (SCs) and the scheduled tribes (STs). The commission recommended for reservation of 27% government jobs for the Other Backward Classes (OBCs) so that the total reservation for all ((SCs, STs and OBCs) amounts to 50%.7 It was after ten years in 1990 that the V.P. Singh Government declared reservation of 27% government jobs for the OBCs. Again in 1991, the Narasimha Rao Government introduced two changes: (a) preference to the poorer sections among the OBCs in the 27% quota, i.e., adoption of the economic criteria in granting reservation, and (b) reservation of another 10% of jobs for poorer (economically backward) sections of higher castes who are not covered by any existing schemes of reservation.

In the famous Mandal case (1992), the scope and extent of Article 16(4), which provides for reservation of jobs in favour of backward classes, has been examined thoroughly by the Supreme Court. Though the Court has rejected the additional reservation of 10% for poorer sections of higher castes, it upheld the constitutional validity of 27% reservation for the OBCs with certain conditions, viz,

    1. The advanced sections among the OBCs (the creamy layer) should be excluded from the list of beneficiaries of reservation.
    2. No reservation in promotions; reservation should be confined to initial appointments only. Any existing reservation in promotions can continue for five years only (i.e., upto 1997).
    3. The total reserved quota should not exceed 50% except in some extraordinary situations. This rule should be applied every year.
    4. The ‘carry forward rule’ in case of unfilled (backlog) vacancies is valid. But it should not violate 50% rule.
    5. A permanent statutory body should be established to examine complaints of over-inclusion and under-inclusion in the list of OBCs.

With regard to the above rulings of the Supreme Court, the government has taken the following actions:

    1. Ram Nandan Committee was appointed to identify the creamy layer among the OBCs. It submitted its report in 1993, which was accepted.
    2. National Commission for Backward Classes was established in 1993 by an act of Parliament. Its mandate was to examine the complaints of under-inclusion, over-inclusion or non-inclusion of any class of citizens in the list of backward classes for the purpose of job reservation. Later, the 102nd Amendment Act of 2018 conferred a constitutional status on the commission and also enlarged its functions. For this purpose, the amendment inserted a new Article 338-B in the constitution.
    3. In order to nullify the ruling with regard to reservation in promotions, the 77th Amendment Act was enacted in 1995. It added a new provision in Article 16 that empowers the State to provide for reservation in promotions of any services under the State in favour of the SCs and STs that are not adequately represented in the state services. Again, the 85th Amendment Act of 2001 provides for ‘consequential seniority’ in the case of promotion by virtue of rule of reservation for the government servants belonging to the SCs and STs with retrospective effect from June 1995.
    4. The ruling with regard to backlog vacancies was nullified by the 81st Amendment Act of 2000. It added another new provision in Article 16 that empowers the State to consider the unfilled reserved vacancies of a year as a separate class of vacancies to be filled up in any succeeding year or years. Such class of vacancies are not to be combined with the vacancies of the year in which they are being filled up to determine the ceiling of 50% reservation on total number of vacancies of that year. In brief, it ends the 50% ceiling on reservation in backlog vacancies.
    5. The 76th Amendment Act of 1994 has placed the Tamil Nadu Reservations Act of 1994 in the Ninth Schedule to protect it from judicial review as it provided for 69 per cent of reservation, far exceeding the 50 per cent ceiling.

मंडल आयोग और उसके परिणाम

वर्ष 1979 में मोरारजी देसाई सरकार ने द्वितीय पिछड़ा वर्ग आयोग’ का गठन संसद सदस्य बी.पी. मंडल की अध्यक्षता में किया। अनुच्छेद 340 के तहत संविधान पिछड़े वर्गों के लोगों की शैक्षणिक एवं सामाजिक स्थिति की जांच करते हुए उनकी उन्नति के लिए सुझाव प्रस्तुत करने की व्यवस्था करता है। आयोग ने अपनी रिपोर्ट 1980 में प्रस्तुत की और 3743 जातियों की पहचान की जो सामाजिक एवं शैक्षणिक आधार पर पिछडी थीं। जनसंख्या में उनका हिस्सा करीब 52 प्रतिशत था जिसमें अनुसूचित जाति एवं जनजाति शामिल नहीं है। आयोग ने अन्य पिछडे वर्गों के लोगों के लिए सरकारी नौकरियों में 27 प्रतिशत आरक्षण की सिफारिश की। इस तरह संपूर्ण आरक्षण (अनुसूचित जाति, जनजाति एवं अन्य पिछड़े वर्गों का) 50 प्रतिशत हो गया। दस वर्ष पश्चात् 1990 में वी.पी. सिंह सरकार ने सरकारी सेवाओं में अन्य पिछड़े वर्ग के लोगों के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण की घोषणा कर दी। दोबारा 1991 में नरसिंहराव सरकार ने दो परिवर्तन प्रस्तुत किए (क) 27 प्रतिशत में पिछड़े वर्ग के गरीब लोगों को प्रमुखता जैसे आर्थिक आधार पर आरक्षण और (ख) 10 प्रतिशत का अतिरिक्त आरक्षण गरीबों के लिए (आर्थिक रूप के पिछड़े) विशेष रूप से उच्च जातियों में आर्थिक रूप से कमजोरों के लिए भी व्यवस्था की।

प्रसिद्ध मंडल केस (1992) में, अनुच्छेद 16 (4) के विस्तार एवं व्यवस्था पिछड़े वर्गों के पक्ष में जिस रोजगार आरक्षण की व्यवस्था की गई है उसका परीक्षण उच्चतम न्यायालय द्वारा किया गया। यद्यपि न्यायालय ने उच्च जातियों के खास वर्ग के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था को अस्वीकार कर दिया, फिर भी अन्य पिछड़े वर्गों के लिए कुछ शर्तों के साथ 27 प्रतिशत आरक्षण की संवैधानिक वैधता को बनाए रखा।

    1. अन्य पिछड़े वर्गों के क्रीमीलेयर से संबंधित लोगों को आरक्षण की सुविधा से बाहर रखा जाना चाहिए।
    2. प्रोन्नति में कोई आरक्षण नहीं, आरक्षण की व्यवस्था केवल शुरुआती नियुक्ति के समय होनी चाहिए। प्रोन्नति के लिए कोई खास आरक्षण केवल पांच वर्षों तक लागू रह सकता है (1997 तक)।
    3. केवल कुछ असाधारण परिस्थितियों को छोड़कर। कुल आरक्षित कोटा 50 प्रतिशत से ज्यादा नहीं होना चाहिए। यह नियम प्रत्येक वर्ष लागू होना चाहिए।
    4. आगे ले जाने का नियम (कैरी फॉरवंड नियम) रिक्त पदों (बैकलॉग) के लिए वैध रहेगा। लेकिन इसमें भी 50 प्रतिशत के सिद्धांत का उल्लंघन नहीं होना चाहिए।
    5. अन्य पिछड़े वर्गों की सूची में अति जोड़ (over inclusion) या न्यून जोड़ (under inclusion) के परीक्षण के लिए एक स्थायी गैर-विधायी इकाई होनी चाहिए।

उच्चतम न्यायालय की उपरोक्त व्यवस्था के बाद सरकार ने निम्नलिखित कदम उठाए:

    1. अन्य पिछड़े वर्गों में क्रीमीलेयर की पहचान के लिए राम नंदन समिति का गठन किया। इसने 1993 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की जिसे स्वीकार कर लिया गया।
    2. संसद के एक अधिनियम द्वारा 1993 में पिछड़े वर्गों के लिए राष्ट्रीय आयोग का गठन किया गया। यह नौकरी आरक्षण के उद्देश्य से सूची में नाम जोड़ने व निकालने पर विचार करता है।
    3. प्रोन्नति में आरक्षण को समाप्त करने के मामले में 77वें संशोधन अधिनियम को 1995 में पास कराया गया। इसने अनुच्छेद 16 में नई व्यवस्था जोड़ी। इसके तहत राज्यों को शक्ति प्रदान की गई कि राज्य सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व न होने की स्थिति में राज्य के अंतर्गत सेवाओं में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को प्रोन्नति में आरक्षण दिया जा सकता है। 2001 का 85वां संशोधन अधिनियम अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति सरकारी सेवकों हेतु आरक्षण नियम के तहत प्रोन्नति के मामले में परिणामिक वरिष्ठता की व्यवस्था करता है। इसे पूर्वगामी जून, 1955 से प्रभावी किया गया।
    4. बैकलॉग रिक्तियों के संबंध में निर्णय को 81वें संशोधन अधिनियम 2000 के तहत रह किया गया। इसने अनुच्छेद 16 में एक और व्यवस्था को जोड़ा। इससे राज्य ने रिक्त आरक्षित पदों को अनुवर्ती वर्ष या वर्षों में भरने के लिए शक्तिशाली बनाया। इस तरह के आरक्षित वर्ग को उस वर्ष के, जिसमें भर्तियां हुईं, साथ नहीं जोड़ा गया ताकि आरक्षण की 50 प्रतिशत की सीमा का पालन किया जा सके। संक्षेप में, इसने बैकलॉग रिक्तियों में आरक्षण की 50 प्रतिशत सीमा को समाप्त कर दिया।
    5. 76वें संशोधन अधिनियम 1994 ने तमिलनाडु आरक्षण अधिनियम, 1994 9वीं सूची में न्यायिक समीक्षा के तहत 69 प्रतिशत आरक्षण को 50 प्रतिशत के स्थान पर स्थापित कर दिया गया।

Reservation for EWSs in Public Employment

The above exception (d) was added by the 103rd Amendment Act of 2019. In order to give effect to this provision, the central government issued an order (in 2019) providing 10% reservation to the Economically Weaker Sections (EWSs) in civil posts and services in the Government of India. The benefit of this reservation can be availed by the persons belonging to EWSs who are not covered under any of the existing schemes of reservation for SCs, STs and OBCs. The eligibility criteria laid down in this regard has already been explained under Article 15.

Further, the scientific and technical posts which satisfy all the following conditions can be exempted from the purview of this reservation:

    1. The posts should be in grades above the lower grade in Group A of the service concerned.
    2. They should be classified as “scientific or technical” in terms of Cabinet Secretariat Order (1961), according to which scientific and technical posts for which qualifications in the natural sciences or exact sciences or applied sciences or in technology are prescribed and the incumbents of which have to use that knowledge in the discharge of their duties.
    3. The posts should be for conducting research or for organizing, guiding and directing research.

सार्वजनिक रोजगार में ईडब्ल्यूएस के लिए आरक्षण

उपरोक्त अपवाद (डी) 2019 के 103 वें संशोधन अधिनियम द्वारा जोड़ा गया था। इस प्रावधान को प्रभावी करने के लिए, केंद्र सरकार ने एक आदेश जारी किया (2019 में) आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (ईडब्ल्यूएस) को सिविल पदों में 10% आरक्षण प्रदान करने के लिए और भारत सरकार में सेवाएं। इस आरक्षण का लाभ ईडब्ल्यूएस से संबंधित व्यक्तियों द्वारा लिया जा सकता है जो अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण की मौजूदा योजनाओं में शामिल नहीं हैं। इस संबंध में निर्धारित पात्रता मानदंड पहले ही अनुच्छेद 15 के तहत समझाया गया है।

इसके अलावा, वैज्ञानिक और तकनीकी पद जो निम्नलिखित सभी शर्तों को पूरा करते हैं उन्हें इस आरक्षण के दायरे से छूट दी जा सकती है:

  • पद संबंधित सेवा के ग्रुप ए में निचले ग्रेड से ऊपर के ग्रेड में होने चाहिए।
  • उन्हें कैबिनेट सचिवालय आदेश (1961) के संदर्भ में “वैज्ञानिक या तकनीकी” के रूप में वर्गीकृत किया जाना चाहिए, जिसके अनुसार वैज्ञानिक और तकनीकी पद जिनके लिए प्राकृतिक विज्ञान या सटीक विज्ञान या तकनीक में या प्रौद्योगिकी में योग्यता निर्धारित की गई है और जिनमें से हैं अपने कर्तव्यों के निर्वहन में उस ज्ञान का उपयोग करना होगा।
  • पदों का संचालन अनुसंधान के लिए या अनुसंधान के आयोजन, मार्गदर्शन और निर्देशन के लिए होना चाहिए।

4. Abolition of Untouchability

Article 17 abolishes ‘untouchability’ and forbids its practice in any form. The enforcement of any disability arising out of untouchability shall be an offence punishable in accordance with law.

In 1976, the Untouchability (Offences) Act, 1955 has been comprehensively amended and renamed as the Protection of Civil Rights Act, 1955 to enlarge the scope and make penal provisions more stringent. The act defines civil right as any right accruing to a person by reason of the abolition of untouchability by Article 17 of the Constitution.

The term ‘untouchability’ has not been defined either in the Constitution or in the Act. However, the Mysore High Court held that the subject matter of Article 17 is not untouchability in its literal or grammatical sense but the ‘practice as it had developed historically in the country’. It refers to the social disabilities imposed on certain classes of persons by reason of their birth in certain castes. Hence, it does not cover social boycott of a few individuals or their exclusion from religious services, etc.

The Supreme Court held that the right under Article 17 is available against private individuals and it is the constitutional obligation of the State to take necessary action to ensure that this right is not violated.

  1. अस्पृश्यता का अंत

अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता को समाप्त करने की व्यवस्था और किसी भी रूप में इसका आचरण निषिद्ध करता है। अस्पृश्यता से उपजी किसी निर्योग्यता को लागू करना अपराध होगा, जो विधि अनुसार दंडनीय होगा।

1976 में, अस्पृश्यता (अपराध) अधिनियम, 1955 में मूलभूत संशोधन किया गया और इसको नया नाम ‘नागरिक अधिकारों की रक्षा अधिनियम 1955’ दिया गया तथा इसमें विस्तार कर दंडिक उपबंध और सख्त बनाए गए। अधिनियम में अस्पृश्यता के प्रत्येक प्रकार को समाप्त करते हुए अनुच्छेद 17 में व्यवस्था सुनिश्चित की गई।

‘अस्पृश्यता’ शब्द को न तो संविधान में और न ही अधिनियम में परिभाषित किया गया। हालांकि मैसूर उच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 17 के मामले में व्यवस्था दी कि शाब्दिक एवं व्याकरणीय समझ से परे इसका प्रयोग ऐतिहासिक है। इसका संदर्भ है कि कुछ वर्गों के कुछ लोगों को उनके जन्म एवं कुछ जातियों के आधार सामाजिक निर्योग्यता। अत: यह कुछ व्यक्तियों के सामाजिक, बहिष्कार और धर्म संबंधी सेवाओं इत्यादि से इनका बहिष्कार नहीं है।

जन अधिकार सुरक्षा अधिनियम (1955) के अंतर्गत छुआछूत को दंडनीय अपराध घोषित किया गया। इसके तहत 6 माह का कारावास या 500 रुपये का दंड अथवा दोनों शामिल हैं। जो व्यक्ति इसके तहत दोषी करार दिया जाए, उसे संसद या राज्य विधानमंडल चुनाव के लिए अयोग्य करार देने की व्यवस्था की गई।

यह अधिनियम निम्नलिखित को अपराध मानता है :

क) किसी व्यक्ति को सार्वजनिक पूजा स्थल में प्रवेश से रोकना या कहीं पर पूजा से रोकना।

(ख) परंपरागत, धार्मिक, दार्शनिक या अन्य आधार पर ‘अस्पृश्यता’ को न्यायोचित ठहराना।

(ग) किसी दुकान, होटल या सार्वजनिक मनोरंजन स्थल में प्रवेश से इंकार करना।

(घ) ‘अस्पृश्यता के आधार पर अनुसूचित जाति के किसी व्यक्ति की बेइज्जती करना।

(छ) अस्पतालों, शैक्षणिक संस्थानों या हॉस्टल में सार्वजनिक हित के लिए प्रवेश से रोकना।

(च) प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अस्पृश्यता को मानना।

(छ) किसी व्यक्ति को सामान बिक्री या सेवाएं देने से रोकना।

उच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद 17 के तहत यह व्यवस्था दी कि यह अधिकार निजी व्यक्ति और राज्य का संवैधानिक दायित्व होगा कि इस अधिकार के हनन को रोकने के लिए जरूरी कदम उठाएं।

5. Abolition of Titles

Article 18 abolishes titles and makes four provisions in that regard:

    1. It prohibits the state from conferring any title (except a military or academic distinction) on any body, whether a citizen or a foreigner.
    2. It prohibits a citizen of India from accepting any title from any foreign state.
    3. A foreigner holding any office of profit or trust under the state cannot accept any title from any foreign state without the consent of the president.
    4. No citizen or foreigner holding any office of profit or trust under the State is to accept any present, emolument or office from or under any foreign State without the consent of the president.

From the above, it is clear that the hereditary titles of nobility like Maharaja, Raj Bahadur, Rai Bahadur, Rai Saheb, Dewan Bahadur, etc, which were conferred by colonial States are banned by Article 18 as these are against the principle of equal status of all.

In 1996, the Supreme Court upheld the constitutional validity of the National Awards–Bharat Ratna, Padma Vibhushan, Padma Bhushan and Padma Sri. It ruled that these awards do not amount to ‘titles’ within the meaning of Article 18 that prohibits only hereditary titles of nobility. Therefore, they are not violative of Article 18 as the theory of equality does not mandate that merit should not be recognised. However, it also ruled that they should not be used as suffixes or prefixes to the names of awardees. Otherwise, they should forfeit the awards.

These National Awards were instituted in 1954. The Janata Party government headed by Morarji Desai discontinued them in 1977. But they were again revived in 1980 by the Indira Gandhi government.

5. उपाधियों का अंत

अनुच्छेद 18 उपाधियों का अंत करता है और इस संबंध में चार प्रावधान करता है:

    1. यह निषेध करता है कि राज्य सेना या विद्या संबंधी सम्मान के सिवाएं और कोई उपाधि प्रदान नहीं करेगा।
    2. यह निषेध करता है कि भारत का कोई नागरिक विदेशी राज्य से कोई उपाधि प्राप्त नहीं करेगा।
    3. कोई विदेशी, राज्य के अधीन लाभ या विश्वास के किसी पद को धारण करते हुए किसी विदेशी राज्य से कोई भी उपाधि राष्ट्रपति की सहमति के बिना स्वीकार नहीं करेगा।
    4. राज्य के अधीन लाभ या विश्वास का पद धारण करने वाला कोई व्यक्ति किसी विदेशी राज्य से या उसके अधीन किसी रूप में कोई भेंट, उपलब्धि या पद राष्ट्रपति की सहमति के बिना स्वीकार नहीं करेगा।

उपरोक्त प्रावधानों में यह स्पष्ट किया गया कि औपनिवेशिक राज्य के समय दिए जाने वाले वंशानुगत पद, जैसे-महाराजा, राज बहादुर, राय बहादुर, राज साहब, दीवान बहादुर आदि को अनुच्छेद 18 के तहत प्रतिबंधित किया गया क्योंकि ये सब राज्य के समक्ष समानता के अधिकार के विरुद्ध थे।

1996 में उच्चतम न्यायालय ने जिन उपलब्धियों की संवैधानिक वैधता को उचित ठहराया था, उनमें पद्म विभूषण, पद्य भूषण एवं पद्म श्री हैं। न्यायालय ने कहा कि ये पुरस्कार उपाधि नहीं हैं तथा अनुच्छेद 18 में वर्णित प्रावधानों का इनसे उल्लंघन नहीं होता है। इस तरह ये समानता के सिद्धांत के प्रतिकूल नहीं हैं। हालांकि यह भी व्यवस्था की गई कि पुरस्कार पाने वालों के नाम के प्रत्यय या उपसर्ग के रूप में इनका इस्तेमाल नहीं होना चाहिए, अन्यथा उन्हें पुरस्कारों को त्यागना होगा।

इन राष्ट्रीय पुरस्कारों की संस्थापना 1954 में हुई। 1977 में मोरारजी देसाई के नेतृत्व वाली जनता पार्टी ने उनका क्रम तोड़ दिया लेकिन 1980 में इंदिरा गांधी सरकार द्वारा उन्हें पुनः प्रारंभ कर दिया गया।


1. Protection of Six Rights

Article 19 guarantees to all citizens the six rights. These are:

    1. Right to freedom of speech and expression.
    2. Right to assemble peaceably and without arms.
    3. Right to form associations or unions or co-operative societies.
    4. Right to move freely throughout the territory of India.
    5. Right to reside and settle in any part of the territory of India.
    6. Right to practice any profession or to carry on any occupation, trade or business.

Originally, Article 19 contained seven rights. But, the right to acquire, hold and dispose of property was deleted by the 44th Amendment Act of 1978.

These six rights are protected against only state action and not private individuals. Moreover, these rights are available only to the citizens and to shareholders of a company but not to foreigners or legal persons like companies or corporations, etc.

The State can impose ‘reasonable’ restrictions on the enjoyment of these six rights only on the grounds mentioned in the Article 19 itself and not on any other grounds.

स्वतंत्रता का अधिकार

1. छह अधिकारों की रक्षा

अनुच्छेद 19 सभी नागरिकों को छह अधिकारों की गारंटी देता है। ये हैं:

  1. वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता।
  2. शांतिपूर्वक और निरायुध सम्मेलन का अधिकार।
  3. संगम संघ या सहकारी समितियां बनाने का अधिकार।
  4. भारत के राज्यक्षेत्र में सर्वत्र अबाध संचरण का अधिकार ।
  5. भारत के राज्य क्षेत्र के किसी भाग में निर्बाध घूमने और बस जाने या निवास करने का अधिकार।
  6. कोई भी वृत्ति, व्यापार या कारोबार करने का अधिकार।

मूलतः अनुच्छेद 19 में 7 अधिकार थे, लेकिन संपत्ति को खरीदने, अधिग्रहण करने या बेच देने के अधिकार को 1978 में 44वें संशोधन अधिनियम के तहत समाप्त कर दिया गया।

इन छह अधिकारों की रक्षा केवल राज्य के खिलाफ मामले में है न कि निजी मामले में। अर्थात् ये अधिकार केवल नागरिकों और कंपनी के शेयर धारकों के लिए हैं, न कि विदेशी या कानूनी लोगों जैसे कंपनियों या परिषदों के लिए।

राज्य इन छह अधिकारों पर अनुच्छेद 19 में उल्लिखित आधारों पर ‘उचित’ प्रतिबंध लगा सकता है।

Freedom of Speech and Expression:

It implies that every citizen has the right to express his views, opinions, belief and convictions freely by word of mouth, writing, printing, picturing or in any other manner. The Supreme Court held that the freedom of speech and expression includes the following:

    1. Right to propagate one’s views as well as views of others.
    2. Freedom of the press.
    3. Freedom of commercial advertisements.
    4. Right against tapping of telephonic conversation.
    5. Right to telecast, that is, government has no monopoly on electronic media.
    6. Right against bundh called by a political party or organisation.
    7. Right to know about government activities.
    8. Freedom of silence.
    9. Right against imposition of pre-censorship on a newspaper.
    10. Right to demonstration or picketing but not right to strike.

The State can impose reasonable restrictions on the exercise of the freedom of speech and expression on the grounds of sovereignty and integrity of India, security of the state, friendly relations with foreign states, public order, decency or morality, contempt of court, defamation, and incitement to an offence.

वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

यह प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति दर्शाने, मत देने, विश्वास एवं अभियोग लगाने की मौखिक, लिखित, छिपे हुए मामलों पर स्वतंत्रता देता है। उच्चतम न्यायालय ने वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में निम्नलिखित को सम्मिलित कियाः

  1. अपने या किसी अन्य के विचारों को प्रसारित करने का अधिकार।
  2. प्रेस की स्वतंत्रता।
  3. व्यावसायिक विज्ञापन की स्वतंत्रता।
  4. फोन टैपिंग के विरुद्ध अधिकार।
  5. प्रसारित करने का अधिकार अर्थात् सरकार का इलैक्ट्रॉनिक मीडिया पर एकाधिकार नहीं है।
  6. किसी राजनीतिक दल या संगठन द्वारा आयोजित बंद के खिलाफ अधिकार।
  7. सरकारी गतिविधियों की जानकारी का अधिकार।
  8. शांति का अधिकार।
  9. किसी अखबार पर पूर्व प्रतिबंध के विरुद्ध अधिकार।
  10. प्रदर्शन एवं विरोध का अधिकार, लेकिन हड़ताल का अधिकार नहीं।

राज्य वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर उचित प्रतिबंध लगा सकता है। यह प्रतिबंध लगाने के आधार इस प्रकार हैंभारत की एकता एवं संप्रभुता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों से मित्रवत संबंध, सार्वजनिक आदेश, नैतिकता की स्थापना, न्यायालय की अवमानना, किसी अपराध में संलिप्तता आदि।

Freedom of Assembly:

 Every citizen has the right to assemble peaceably and without arms. It includes the right to hold public meetings, demonstrations and take out processions. This freedom can be exercised only on public land and the assembly must be peaceful and unarmed. This provision does not protect violent, disorderly, riotous assemblies, or one that causes breach of public peace or one that involves arms. This right does not include the right to strike.

The State can impose reasonable restrictions on the exercise of right of assembly on two grounds, namely, sovereignty and integrity of India and public order including the maintenance of traffic in the area concerned.

Under Section 144 of Criminal Procedure Code (1973), a magistrate can restrain an assembly, meeting or procession if there is a risk of obstruction, annoyance or danger to human life, health or safety or a disturbance of the public tranquillity or a riot or any affray.

Under Section 141 of the Indian Penal Code, as assembly of five or more persons becomes unlawful if the object is (a) to resist the execution of any law or legal process; (b) to forcibly occupy the property of some person; (c) to commit any mischief or criminal trespass; (d) to force some person to do an illegal act; and (e) to threaten the government or its officials on exercising lawful powers.

शांतिपूर्वक सम्मेलन की स्वतंत्रता

किसी भी नागरिक को बिना हथियार के शांतिपूर्वक संगठित होने का अधिकार है। इसमें शामिल हैं-सार्वजनिक बैठकों में भाग लेने का अधिकार एवं प्रदर्शन। इस स्वतंत्रता का उपयोग केवल सार्वजनिक भूमि पर बिना हथियार के किया जा सकता है। यह व्यवस्था हिंसा, अव्यवस्था, गलत संगठन एवं सार्वजनिक शांति भंग के लिए नहीं है। इस अधिकार में हड़ताल का अधिकार शामिल नहीं है।

राज्य संगठित होने के अधिकार पर दो आधारों पर प्रतिबंध लगा सकता है भारत की एकता अखंडता एवं सार्वजनिक आदेश, सहित संबंधित क्षेत्र में यातायात नियंत्रण।

आपराधिक व्यवस्था की धारा 144(1973) के अंतर्गत एक न्यायधीश किसी संगठित बैठक को किसी व्यवधान के खतरे के तहत रोक सकता है। इसे रोकने का आधार मानव जीवन के लिए खतरा, स्वास्थ्य एवं सुरक्षा, सार्वजनिक जीवन में व्यवधान या दंगा भड़काने का खतरा भी है।

भारतीय दंड संहिता की धारा 141 के तहत पांच या उससे अधिक लोगों का संगठन गैर-कानूनी हो सकता है यदि किसी कानूनी प्रक्रिया को अवरोध हो, (1) कुछ लोगों की संपत्ति पर बलपूर्वक कब्जा हो, (ii) किसी आपराधिक कार्य की चर्चा हो, (iv) किसी व्यक्ति पर गैर-कानूनी काम के लिए दबाव और (v) सरकार या उसके कर्मचारियों को उनकी विधायी शक्तियों के प्रयोग हेतु धमकाना।

Freedom of Association:

All citizens have the right to form associations or unions or cooperative societies. It includes the right to form political parties, companies, partnership firms, societies, clubs, organisations, trade unions or any body of persons. It not only includes the right to start an association or union but also to continue with the association or union as such. Further, it covers the negative right of not to form or join an association or union.

Reasonable restrictions can be imposed on the exercise of this right by the State on the grounds of sovereignty and integrity of India, public order and morality. Subject to these restrictions, the citizens have complete liberty to form associations or unions for pursuing lawful objectives and purposes. However, the right to obtain recognition of the association is not a fundamental right.

The Supreme Court held that the trade unions have no guaranteed right to effective bargaining or right to strike or right to declare a lockout. The right to strike can be controlled by an appropriate industrial law.

संगम या संघ बनाने का अधिकार

सभी नागरिकों को सभा, संघ अथवा सहकारी समितियां गठित करने का अधिकार होगा। इसमें शामिल हैं-राजनीतिक दल बनाने का अधिकार, कंपनी, साझा फर्म, समितियां, क्लब, संगठन, व्यापार संगठन या लोगों की अन्य इकाई बनाने का अधिकार। यह न केवल संगम या संघ बनाने का अधिकार प्रदान करता है, वरन उन्हें नियमित रूप से संचालित करने का अधिकार भी प्रदान करता है। इसके अतिरिक्त यह संगम या संघ बनाने या उसमें शामिल होने के नकारात्मक अधिकार को भी शामिल करता है।

इस अधिकार पर भी राज्य द्वारा युक्तियुक्त प्रतिबंध लगाया जा सकता है। इसके आधार हैं-भारत की एकता एवं संप्रभुता, सार्वजनिक आदेश एवं नैतिकता। इन प्रतिबंधों का आधार है कि नागरिकों को कानूनी प्रक्रियाओं के तहत कानून सम्मत उद्देश्यों के लिए संगम या संघ बनाने का अधिकार है तथापि किसी संगम की स्वीकारोक्ति मूल अधिकार नहीं है।

उच्चतम न्यायालय ने व्यवस्था दी कि श्रम संगठनों को मोलभाव करने, हड़ताल करने एवं तालाबंदी करने का कोई अधिकार नहीं है। हड़ताल के अधिकार को उपयुक्त औद्योगिक कानून के तहत नियंत्रित किया जा सकता है।

Freedom of Movement:

This freedom entitles every citizen to move freely throughout the territory of the country. He can move freely from one state to another or from one place to another within a state. This right underline the idea that India is one unit so far as the citizens are concerned. Thus, the purpose is to promote national feeling and not parochialism.

The grounds of imposing reasonable restrictions on this freedom are two, namely, the interests of general public and the protection of interests of any scheduled tribe. The entry of outsiders in tribal areas is restricted to protect the distinctive culture, language, customs and manners of scheduled tribes and to safeguard their traditional vocation and properties against exploitation.

The Supreme Court held that the freedom of movement of prostitutes can be restricted on the ground of public health and in the interest of public morals. The Bombay High Court validated the restrictions on the movement of persons affected by AIDS.

The freedom of movement has two dimensions, viz, internal (right to move inside the country) and external (right to move out of the country and right to come back to the country). Article 19 protects only the first dimension. The second dimension is dealt by Article 21 (right to life and personal liberty).

अबाध संचरण की स्वतंत्रता

यह स्वतंत्रता प्रत्येक नागरिक को देश के किसी भी हिस्से में संचरण का अधिकार प्रदान करती है। वह स्वतंत्रतापूर्वक एक राज्य से दूसरे राज्य में या एक राज्य में एक से दूसरे स्थान पर संचरण कर सकता है। यह अधिकार इस बात को बल देता है कि भारत सभी नागरिकों के लिए एक है। इसका उद्देश्य राष्ट्रीय सोच को बढ़ावा देना है न कि संकीर्णता को।

इस स्वतंत्रता पर उचित प्रतिबंध लगाने के दो कारण हैंआम लोगों का हित और किसी अनुसूचित जनजाति की सुरक्षा या हित। जनजातीय क्षेत्रों में बाहर के लोगों के प्रवेश को उनकी विशेष संस्कृति, भाषा, रिवाज और जनजातीय प्रावधानों के तहत प्रतिबंधित किया जा सकता है, ताकि उनका शोषण न हो सके।

उच्चतम न्यायालय ने इसमें व्यवस्था दी कि किसी वैश्या के संचरण के अधिकार को सार्वजनिक नैतिकता एवं सार्वजनिक स्वास्थ्य के आधार पर प्रतिबंधित किया जा सकता है । बम्बई उच्च न्यायालय ने एड्स पीड़ित व्यक्ति के संचरण पर प्रतिबंध को वैध बताया।

संचरण की स्वतंत्रता के दो भाग हैं-आंतरिक (देश में निर्बाध संचरण) और बाह्य (देश के बाहर घूमने का अधिकार) तथा देश में वापस आने का अधिकार। अनुच्छेद 19 मात्र पहले भाग की रक्षा करता है। दूसरे, भाग को अनुच्छेद 21 (प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार) व्याख्यायित करता है।

Freedom of Residence:

Every citizen has the right to reside and settle in any part of the territory of the country. This right has two parts: (a) the right to reside in any part of the country, which means to stay at any place temporarily, and (b) the right to settle in any part of the country, which means to set up a home or domicile at any place permanently.

This right is intended to remove internal barriers within the country or between any of its parts. This promotes nationalism and avoids narrow mindedness.

The State can impose reasonable restrictions on the exercise of this right on two grounds, namely, the interest of general public and the protection of interests of any scheduled tribes. The right of outsiders to reside and settle in tribal areas is restricted to protect the distinctive culture, language, customs and manners of scheduled tribes and to safeguard their traditional vocation and properties against exploitation. In many parts of the country, the tribals have been permitted to regulate their property rights in accordance with their customary rules and laws.

The Supreme Court held that certain areas can be banned for certain kinds of persons like prostitutes and habitual offenders.

From the above, it is clear that the right to residence and the right to movement are overlapping to some extent. Both are complementary to each other.

निवास का अधिकार

हर नागरिक को देश के किसी भी हिस्से में बसने का अधिकार है। इस अधिकार के दो भाग हैं-(अ) देश के किसी भी हिस्से में रहने का अधिकार-इसका तात्पर्य है कि कहीं भी अस्थायी रूप से रहना एवं (ब) देश के किसी भी हिस्से में व्यवस्थित होने का अधिकार-इसका तात्पर्य है वहां घर बनाना एवं स्थायी रूप से बसना।

यह अधिकार देश के अंदर कहीं जाने के आंतरिक अवरोधों का समाप्त करता है। यह राष्ट्रवाद को प्रोत्साहित करता है और संकीर्ण मानसिकता को महत्व प्रदान नहीं करता।

राज्य इस अधिकार पर उचित प्रतिबंध दो आधारों पर लगा सकता है-विशेष रूप से आम लोगों के हित में और अनुसूचित जनजातियों के हित में। जनजातीय क्षेत्रों में उनकी संस्कृति भाषा एवं रिवाज के आधार पर बाहर के लोगों का, प्रवेश प्रतिबंधित किया जा सकता है। देश के कई भागों में जनजातियों को अपनी संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन हेतु अपने रिवाज एवं नियमकानून के बनाने का अधिकार है।

उच्चतम न्यायालय ने कुछ क्षेत्रों में लोगों के घूमने पर प्रतिबंध लगाया है-जैसे वेश्या या पेशेवर अपराधी।

उपरोक्त प्रावधान में से यह स्पष्ट है कि निवास का अधिकार एवं घूमने के अधिकारों का कुछ विस्तार भी किया जा सकता है। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं।

Freedom of Profession, etc.:

All citizens are given the right to practise any profession or to carry on any occupation, trade or business. This right is very wide as it covers all the means of earning one’s livelihood.

The State can impose reasonable restrictions on the exercise of this right in the interest of the general public. Further, the State is empowered to:

    1. prescribe professional or technical qualifications necessary for practising any profession or carrying on any occupation, trade or business; and
    2. carry on by itself any trade, business, industry or service whether to the exclusion (complete or partial) of citizens or otherwise.

Thus, no objection can be made when the State carries on a trade, business, industry or service either as a monopoly (complete or partial) to the exclusion of citizens (all or some only) or in competition with any citizen. The State is not required to justify its monopoly.

This right does not include the right to carry on a profession or business or trade or occupation that is immoral (trafficking in women or children) or dangerous (harmful drugs or explosives, etc,). The State can absolutely prohibit these or regulate them through licencing.

व्यवसाय आदि की स्वतंत्रता

सभी नागरिकों को किसी भी व्यवसाय को करने, पेशा अपनाने एवं व्यापार शुरू करने का अधिकार दिया गया है। यह अधिकार बहुत विस्तृत है क्योंकि यह जीवन निर्वहन हेतु आय से संबंधित है।

राज्य सार्वजनिक हित में इसके प्रयोग पर युक्तियुक्त प्रतिबंध लगा सकता है। इसके अतिरिक्त राज्य को यह अधिकार है कि वहः (अ) किसी पेशे या व्यवसाय के लिए पेशेगत या तकनीकी योग्यता को जरूरी ठहरा सकता है। (ब) किसी व्यापार, व्यवसाय, उद्योग या सेवा को पूर्ण या आंशिक रूप से स्वयं जारी रख सकता है। इस प्रकार, जब राज्य किसी व्यापार, व्यवसाय उद्योग पर अपना एकाधिकार जताता है तो प्रतियोगिता में आने वाले व्यक्तियों या राज्यों के लिए अपने एकाधिकार को न्यायोचित ठहराने की कोई आवश्यकता नहीं।

इस अधिकार में कोई अनैतिक कृत्य शामिल नहीं हैं, जैसेमहिलाओं या बच्चों का दुरुपयोग या खतरनाक (हानिकारक औषधियों या विस्फोटक आदि) व्यवसाय । राज्य इन पर पूर्णतः प्रतिबंध लगा सकता है या इनके संचालन के लिए लाइसेंस की अनिवार्यता कर सकता है।

2. Protection in Respect of Conviction for Offences

Article 20 grants protection against arbitrary and excessive punishment to an accused person, whether citizen or foreigner or legal person like a company or a corporation. It contains three provisions in that direction:

    1. No ex-post-facto law: No person shall be (i) convicted of any offence except for violation of a law in force at the time of the commission of the act, nor (ii) subjected to a penalty greater than that prescribed by the law in force at the time of the commission of the act.
    2. No double jeopardy: No person shall be prosecuted and punished for the same offence more than once.
    3. No self-incrimination: No person accused of any offence shall be compelled to be a witness against himself.

An ex-post-facto law is one that imposes penalties retrospectively (retroactively), that is, upon acts already done or which increases the penalties for such acts. The enactment of such a law is prohibited by the first provision of Article 20. However, this limitation is imposed only on criminal laws and not on civil laws or tax laws. In other words, a civil liability or a tax can be imposed retrospectively. Further, this provision prohibits only conviction or sentence under an ex-post-facto criminal law and not the trial thereof. Finally, the protection (immunity) under this provision cannot be claimed in case of preventive detention or demanding security from a person.

The protection against double jeopardy is available only in proceedings before a court of law or a judicial tribunal. In other words, it is not available in proceedings before departmental or administrative authorities as they are not of judicial nature.

The protection against self-incrimination extends to both oral evidence and documentary evidence. However, it does not extend to (i) compulsory production of material objects, (ii) compulsion to give thumb impression, specimen signature, blood specimens, and (iii) compulsory exhibition of the body. Further, it extends only to criminal proceedings and not to civil proceedings or proceedings which are not of criminal nature.

  1. अपराध के लिए दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण

अनुच्छेद-20 किसी भी अभियुक्त या दोषी करार व्यक्ति, चाहे वह नागरिक हो या विदेशी या कंपनी व परिषद का कानूनी व्यक्ति हो, उसके विरुद्ध मनमाने और अतिरिक्त दण्ड से संरक्षण प्रदान करता है है। इस संबंध में तीन व्यवस्थाएं हैं:

(अ) कोई पूर्व पद प्रभाव कानूननहीं : कोई व्यक्ति किसी अपराध के लिए तब तक सिद्ध दोष नहीं ठहराया जाएगा, जब तक कि उसने ऐसा कोई कार्य करने के समय, जो अपराध के रूप में आरोपित है, किसी प्रवृत्त विधि का अतिक्रमण नहीं किया है, या (1) उससे अधिक शक्ति का भागी नहीं होगा, जो उस अपराध के लिए जाने के समय प्रवृत्त विधि के अधीन अधिरोपित की जा सकती थी।

(ब) दोहरी क्षति नहीं किसी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए एक बार से अधिक अभियोजित और दंडित नहीं किया जाएगा।

(स) स्व-अभिशंसन नहीं: किसी अपराध के लिए अभियुक्त किसी व्यक्ति को स्वयं अपने विरुद्ध साक्षी होने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा।

एक पूर्व पद प्रभाव-कानून वह है, जो पूर्व व्यापी प्रभाव से दण्ड अध्यारोपित करता है अर्थात् किए गए कृत्यों पर या जो ऐसे कृत्यों हेतु दण्ड को बढ़ाता है। अनुच्छेद 20 के पहले प्रावधान के अंतर्गत इस तरह के क्रियान्वयन पर रोक है। हालांकि इस तरह की सीमाएं कैवल आपराधिक कानूनों में ही हैं, न कि सामान्य सिविल अधिकार या कर कानूनों में। दूसरे शब्दों में, जनउत्तरदायित्व या एक कर को पूर्व व्यापी रूप में लगाया जा सकता है, इसके अतिरिक्त इस तरह की व्यवस्था अपराध दोष या सजा सुनाए जाने के मौके पर आपराधिक कानूनों पर प्रभावी रहती है। अंततः सुरक्षा व्यवस्था के तहत बचाव के मामले में एक व्यक्ति की सुरक्षा की मांग के आधार पर नहीं की जा सकती।

दोहरी क्षति के विरुद्ध सुरक्षा का मामला सिर्फ एक कानूनी न्यायालय या न्यायिक अधिकरण में ही उठाया जा सकता है। दूसरे शब्दों में, यह विभागीय या प्रशासनिक सुनवाई में लागू नहीं हो सकता। चूंकि ये न्यायिक प्रकृति के नहीं हैं। स्व-अभिशंसन के संबंध में मौखिक और प्रलेखीय साक्ष्य दोनों में संरक्षण प्राप्त है। हालांकि यह विस्तारित नहीं किया जा सकता- i) भौतिक विषयों के आवश्यक उत्पादनों पर (ii) अंगूठे के निशान, हस्ताक्षर एवं रक्त जांच की अनिवार्यता पर (iii) किसी इकाई की प्रदर्शनी की अनिवार्यता। इसके अलावा इसका विस्तार केवल आपराधिक सुनवाइयों पर ही हो सकता है, जो आपराधिक प्रकृति की न हों।

3. Protection of Life and Personal Liberty

Article 21 declares that no person shall be deprived of his life or personal liberty except according to procedure established by law. This right is available to both citizens and non-citizens.

In the famous Gopalan case (1950), the Supreme Court has taken a narrow interpretation of the Article 21. It held that the protection under Article 21 is available only against arbitrary executive action and not from arbitrary legislative action. This means that the State can deprive the right to life and personal liberty of a person based on a law. This is because of the expression ‘procedure established by law’ in Article 21, which is different from the expression ‘due process of law’ contained in the American Constitution. Hence, the validity of a law that has prescribed a procedure cannot be questioned on the ground that the law is unreasonable, unfair or unjust. Secondly, the Supreme Court held that the ‘personal liberty’ means only liberty relating to the person or body of the individual. But, in Menaka case (1978), the Supreme Court overruled its judgement in the Gopalan case by taking a wider interpretation of the Article 21. Therefore, it ruled that the right to life and personal liberty of a person can be deprived by a law provided the procedure prescribed by that law is reasonable, fair and just. In other words, it has introduced the American expression ‘due process of law’. In effect, the protection under Article 21 should be available not only against arbitrary executive action but also against arbitrary legislative action. Further, the court held that the ‘right to life’ as embodied in Article 21 is not merely confined to animal existence or survival but it includes within its ambit the right to live with human dignity and all those aspects of life which go to make a man’s life meaningful, complete and worth living. It also ruled that the expression ‘Personal Liberty’ in Article 21 is of the widest amplitude and it covers a variety of rights that go to constitute the personal liberties of a man.

The Supreme Court has reaffirmed its judgement in the Menaka case in the subsequent cases. It has declared the following rights as part of Article 21:

    1. Right to live with human dignity.
    2. Right to decent environment including pollution free water and air and protection against hazardous industries.
    3. Right to livelihood.
    4. Right to privacy.
    5. Right to shelter.
    6. Right to health.
    7. Right to free education up to 14 years of age.
    8. Right to free legal aid.
    9. Right against solitary confinement.
    10. Right to speedy trial.
    11. Right against handcuffing.
    12. Right against inhuman treatment.
    13. Right against delayed execution.
    14. Right to travel abroad.
    15. Right against bonded labour.
    16. Right against custodial harassment.
    17. Right to emergency medical aid.
    18. Right to timely medical treatment in government hospital.
    19. Right not to be driven out of a state.
    20. Right to fair trial.
    21. Right of prisoner to have necessities of life.
    22. Right of women to be treated with decency and dignity.
    23. Right against public hanging.
    24. Right to road in hilly areas.
    25. Right to information.
    26. Right to reputation.
    27. Right of appeal from a judgement of conviction
    28. Right to family pension
    29. Right to social and economic justice and empowerment
    30. Right against bar fetters
    31. Right to appropriate life insurance policy
    32. Right to sleep
    33. Right to freedom from noise pollution
    34. Right to sustainable development
    35. Right to opportunity.
  1. प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता

अनुच्छेद 21 में घोषणा की गई है कि किसी व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जाएगा अन्यथा नहीं। प्रसिद्ध गोपालन मामले (1950) में उच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद 21 की सूक्ष्म व्याख्या की। इसमें व्यवस्था की गई कि अनुच्छेद 21 के तहत सिर्फ मनमानी कार्यकारी प्रक्रिया के विरुद्ध सुरक्षा उपलब्ध है न कि विधानमंडलीय प्रक्रिया के विरुद्ध । इसका मतलब राज्य प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार को कानूनी आधार पर रोक सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि अनुच्छेद 21 की अभिव्यक्ति “विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया” अमेरिका के संविधान 1 में अभिव्यक्ति “विधि की विधिवत प्रक्रिया” से भिन्न है। इस तरह कानून की वैधता एवं उसकी व्यवस्था पर अकारण, अन्यायपूर्ण

आधार पर प्रश्न नहीं उठाया जा सकता। उच्चतम न्यायालय ने व्यवस्था दी कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मतलब सिर्फ एक व्यक्ति की शारीरिक एवं निजी स्वतंत्रता से है। लेकिन मैनका मामले (1978) में उच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद 21 के तहत गोपालन मामले में अपने फैसले को पलट दिया। अत: न्यायालय ने व्यवस्था दी कि प्राण और दैहिक स्वतंत्रता को उचित एवं न्यायपूर्ण मामले के आधार पर रोका जा सकता है। इसके प्रभाव में अनुच्छेद 21 के तहत सुरक्षा केवल मनमानी कार्यकारी क्रिया पर ही उपलब्ध नहीं बल्कि विधानमंडलीय क्रिया के विरुद्ध भी उपलब्ध है। न्यायालय ने ‘प्राण की स्वतंत्रता’ की व्याख्या करते हुए कहा इसके विस्तार का आशय है कि एक व्यक्ति की प्राण स्वतंत्रता में अधिकारों के कई प्रकार हैं-इसमें ‘प्राण के अधिकार’ को शारीरिक बंधनों में नहीं बांधा गया बल्कि इसमें मानवीय सम्मान और इससे जुड़े अन्य पहलुओं को भी रखा गया।

उच्चतम न्यायालय ने मेनका मामले में अपने फैसले को दोबारा स्थापित किया। इसमें अनुच्छेद 21 के भाग के रूप में निम्नलिखित अधिकारों की घोषणा की:

  1. मानवीय प्रतिष्ठा के साथ जीने का अधिकार।
  2. स्वच्छ पर्यावरण प्रदूषण रहित जल एवं वायु में जीने का अधिकार एवं हानिकारक उद्योगों के विरुद्ध सुरक्षा।
  3. जीवन रक्षा का अधिकार।
  4. निजता का अधिकार।
  5. आश्रय का अधिकार।
  6. स्वास्थ्य का अधिकार।
  7. 14 वर्ष की उम्र तक निःशुल्क शिक्षा का अधिकार।
  8. नि:शुल्क कानूनी सहायता का अधिकार।
  9. अकेले कारावास में बंद होने के विरुद्ध अधिकार।
  10. त्वरित सुनवाई का अधिकार।
  11. हथकड़ी लगाने के विरुद्ध अधिकार।
  12. अमानवीय व्यवहार के विरुद्ध अधिकार।
  13. देर से फांसी के विरुद्ध अधिकार।
  14. विदेश यात्रा करने का अधिकार।
  15. बंधुआ मजदूरी करने के विरुद्ध अधिकार ।
  16. हिरासत में शोषण के विरुद्ध अधिकार ।
  17. आपातकालीन चिकित्सा सुविधा का अधिकार।
  18. सरकारी अस्पतालों में समय पर उचित इलाज का अधिकार।
  19. राज्य के बाहर न जाने का अधिकार ।
  20. निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार।
  21. कैदी के लिए जीवन की आवश्यकताओं का अधिकार।
  22. महिलाओं के साथ आदर और सम्मानपूर्वक व्यवहार करने का अधिकार।
  23. सार्वजनिक फांसी के विरुद्ध अधिकार।
  24. सुनवाई का अधिकार।
  25. सूचना का अधिकार।
  26. प्रतिष्ठा का अधिकार।
  27. दोषसिद्धि वाले न्यायालय आदेश से अपील का अधिकार
  28. सामाजिक सुरक्षा तथा परिवार के संरक्षण का अधिकार
  29. सामाजिक एवं आर्थिक न्याय एवं सशक्तीकरण का अधिकार
  30. बार केटर्स के विरुद्ध अधिकार
  31. जीवन बीमा पॉलिसी के विनियोग का अधिकार
  32. शयन का अधिकार
  33. शोर प्रदूषण से मुक्ति का अधिकार
  34. विद्युत (बिजली) का अधिकार

4. Right to Education

Article 21 A declares that the State shall provide free and compulsory education to all children of the age of six to fourteen years in such a manner as the State may determine. Thus, this provision makes only elementary education a Fundamental Right and not higher or professional education.

This provision was added by the 86th Constitutional Amendment Act of 2002. This amendment is a major milestone in the country’s aim to achieve ‘Education for All’. The government described this step as ‘the dawn of the second revolution in the chapter of citizens’ rights’.

Even before this amendment, the Constitution contained a provision for free and compulsory education for children under Article 45 in Part IV. However, being a directive principle, it was not enforceable by the courts. Now, there is scope for judicial intervention in this regard.

This amendment changed the subject matter of Article 45 in directive principles. It now reads–‘The state shall endeavour to provide early childhood care and education for all children until they complete the age of six years.’ It also added a new fundamental duty under Article 51A that reads–‘It shall be the duty of every citizen of India to provide opportunities for education to his child or ward between the age of six and fourteen years’.

In 1993 itself, the Supreme Court recognised a Fundamental Right to primary education in the right to life under Article 21. It held that every child or citizen of this country has a right to free education until he completes the age of 14 years. Thereafter, his right to education is subject to the limits of economic capacity and development of the state. In this judgement, the Court overruled its earlier judgement (1992) which declared that there was a fundamental right to education up to any level including professional education like medicine and engineering.

In pursuance of Article 21A, the Parliament enacted the Right of Children to Free and Compulsory Education (RTE) Act, 2009. This Act seeks to provide that every child has a right to be provided full time elementary education of satisfactory and equitable quality in a formal school which satisfies certain essential norms and standards. This legislation is anchored in the belief that the values of equality, social justice and democracy and the creation of a just and humane society can be achieved only through provision of inclusive elementary education to all.

  1. शिक्षा का अधिकार

अनुच्छेद 21क में घोषणा की गई है कि राज्य 6 से 14 वर्ष तक की उम्र के बच्चों को नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध कराएगा। इसका निर्धारण राज्य करेगा। इस प्रकार यह व्यवस्था केवल आवश्यक शिक्षा के एक मूल अधिकार के अंतर्गत है न कि उच्च या व्यावसायिक शिक्षा के संदर्भ में।

यह व्यवस्था 86वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 2002 के अंतर्गत की गयी है। यह संशोधन देश में ‘सर्वशिक्षा’ के लक्ष्य में एक मील का पत्थर साबित हुआ है। सरकार ने यह कदम नागरिकों के अधिकार के मामले में द्वितीय क्रांति की तरह उठाया है।

इस संशोधन के पहले भी संविधान में भाग 4 के अनुच्छेद 45 में बच्चों के लिए नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था थी तथापि निदेशक सिद्धांत होने के कारण यह न्यायालय द्वारा जरूरी नहीं ठहराया जा सकता था। अब उसमें कानूनी प्रावधान की व्यवस्था है।

यह संशोधन अनुच्छेद 45 के निदेशक सिद्धांत को बदलता है। अब इसे पढ़ा जाता है-‘राज्य सभी बच्चों को चौदह वर्ष की आयु पूरी करने तक निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा देने के लिए उपबंध करने का प्रयास करेगा। इसमें एक मूल कर्तव्य अनुच्छेद 51क के तहत जोड़ा गया-‘प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य होगा कि वह 6 से 14 वर्ष तक के अपने बच्चे को शिक्षा प्रदान कराएगा।’

1993 में उच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद 21 के अंतर्गत स्वयं जीवन के अधिकार में प्राथमिक शिक्षा को मूल अधिकार में जोड़ा। इसमें व्यवस्था की गई कि भारत के किसी भी बच्चे को 14 वर्ष की आयु तक निःशुल्क शिक्षा प्रदान की जाए। इसके उपरांत उसकी शिक्षा का अधिकार आर्थिक क्षमता की सीमा एवं राज्य के विकास का विषय है। इस फैसले में न्यायालय ने अपने पूर्व फैसले (1992) को बदला, जिसमें घोषणा की गई थी कि शिक्षा का अधिकार किसी भी स्तर पर है, जिसमें व्यावसायिक शिक्षा जैसेचिकित्सा एवं इंजीनियरिंग भी शामिल हैं।

अनुच्छेद 21A के अनुसरण में, संसद ने बच्चों को निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम, 2009 अधिनियमित करके इस अधिनियम के अंतर्गत यह व्यवस्था है कि 14 वर्ष की आयु तक के प्रत्येक बच्चे को संतोषजनक एवं समुचित गुणवत्ता वाली पूर्णकालिक प्रारम्भिक शिक्षा एक ऐसे औपचारिक विद्यालय, जिसमें कि अनिवार्य परिपाटियों एवं मानकों का पालन किया जाता हो, में प्राप्त करने का अधिकार है। यह विधान इस दृष्टि से अधिनियमित किया गया है कि समानता, सामाजिक न्याय तथा लोकतंत्र के मूल्यों के साथ ही न्यायपूर्ण एवं मानवीय समाज निर्माण का लक्ष्य सभी को समावेशी प्रारम्भिक शिक्षा प्रदान कर प्राप्त किया जा सके।

5. Protection Against Arrest and Detention

Article 22 grants protection to persons who are arrested or detained. Detention is of two types, namely, punitive and preventive. Punitive detention is to punish a person for an offence committed by him after trial and conviction in a court. Preventive detention, on the other hand, means detention of a person without trial and conviction by a court. Its purpose is not to punish a person for a past offence but to prevent him from committing an offence in the near future. Thus, preventive detention is only a precautionary measure and based on suspicion.

The Article 22 has two parts–the first part deals with the cases of ordinary law and the second part deals with the cases of preventive detention law.

    1. The first part of Article 22 confers the following rights on a person who is arrested or detained under an ordinary law:
      1. Right to be informed of the grounds of arrest.
      2. Right to consult and be defended by a legal practitioner.
      3. Right to be produced before a magistrate within 24 hou including the journey time.
      4. Right to be released after 24 hours unless the magistra authorises further detention.

These safeguards are not available to an enemy alien or a person arrested or detained under a preventive detention law.

The Supreme Court also ruled that the arrest and detention in the first part of Article 22 do not cover arrest under the orders of a court, civil arrest, arrest on failure to pay the income tax, and deportation of an alien. They apply only to an act of a criminal or quasi-criminal nature or some activity prejudicial to public interest.

b.The second part of Article 22 grants protection to persons who are arrested or detained under a preventive detention law. This protection is available to both citizens as well as aliens and includes the following:

    1. The detention of a person cannot exceed three months unless advisory board reports sufficient cause for extended detentio The board is to consist of judges of a high court.
    2. The grounds of detention should be communicated to the deten However, the facts considered to be against the public intere need not be disclosed.
    3. The detenu should be afforded an opportunity to make representation against the detention order.

Article 22 also authorises the Parliament to prescribe (a) the circumstances and the classes of cases in which a person can be detained for more than three months under a preventive detention law without obtaining the opinion of an advisory board; (b) the maximum period for which a person can be detained in any classes of cases under a preventive detention law; and (c) the procedure to be followed by an advisory board in an inquiry.

The 44th Amendment Act of 1978 has reduced the period of detention without obtaining the opinion of an advisory board from three to two months. However, this provision has not yet been brought into force, hence, the original period of three months still continues.

The Constitution has divided the legislative power with regard to preventive detention between the Parliament and the state legislatures. The Parliament has exclusive authority to make a law of preventive detention for reasons connected with defence, foreign affairs and the security of India. Both the Parliament as well as the state legislatures can concurrently make a law of preventive detention for reasons connected with the security of a state, the maintenance of public order and the maintenance of supplies and services essential to the community.

The preventive detention laws made by the Parliament are:

    1. Preventive Detention Act, 1950. Expired in 1969.
    2. Maintenance of Internal Security Act (MISA), 1971. Repealed in 1978.
    3. Conservation of Foreign Exchange and Prevention of Smuggling Activities Act (COFEPOSA), 1974.
    4. National Security Act (NASA), 1980.
    5. Prevention of Blackmarketing and Maintenance of Supplies of Essential Commodities Act (PBMSECA), 1980.
    6. Terrorist and Disruptive Activities (Prevention) Act (TADA), 1985. Repealed in 1995.
    7. Prevention of Illicit Traffic in Narcotic Drugs and Psychotropic Substances Act (PITNDPSA), 1988.
    8. Prevention of Terrorism Act (POTA), 2002. Repealed in 2004.
    9. Unlawful Activities (Prevention) Act (UAPA), 1967, as amended in 2004, 2008, 2012 and 2019.

It is unfortunate to know that no democratic country in the world has made preventive detention as an integral part of the Constitution as has been done in India. It is unknown in USA. It was resorted to in Britain only during first and second world war time. In India, preventive detention existed even during the British rule. For example, the Bengal State Prisoners Regulation of 1818 and the Defence of India Act of 1939 provided for preventive detention.

  1. निरोध एवं गिरफ्तारी से संरक्षण

अनुच्छेद 22 किसी व्यक्ति को गिरफ्तारी एवं निरोध से संरक्षण प्रदान करता है। हिरासत दो तरह की होती हैं-दंड विषयक (कठोर) और निवारक । दंड विषयक हिरासत, एक व्यक्ति को दंड देती है, जिसने अपराध स्वीकार कर लिया है और अदालत में उसे दोषी ठहराया जा चुका है। निवारक हिरासत वह है, जिसमें बिना सुनवाई के अदालत में दोषी ठहराया जाए। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति को पिछले अपराध पर दंडित नकर भविष्य में ऐसे अपराध न करने की चेतावनी देने जैसा है। इस तरह निवारक हिरासत केवल शक के आधार पर एहतियाती होती है।

अनुच्छेद 22 के दो भाग हैं-पहला भाग साधारण कानूनी मामले से संबंधित है, जबकि दूसरा भाग निवारक हिरासत के मामलों से संबंधित है।

(अ) अनुच्छेद 22 का पहला भाग उस व्यक्ति को जिसे साधारण कानून के तहत हिरासत में लिया गया निम्नलिखित अधिकार उपलब्ध कराता है:

(i) गिरफ्तार करने के आधार पर सूचना देने का अधिकार।

(ii) विधि व्यवसायी से परामर्श और प्रतिरक्षा कराने का अधिकार।

(iii) दंडाधिकारी (मजिस्ट्रेट) के सम्मुख 24 घंटे में, यात्रा के समय को मिलाकर पेश होने का अधिकार।

(iv) दंडाधिकारी द्वारा बिना अतिरिक्त निरोध दिए 24 घंटे में रिहा करने का अधिकार।

यह सुरक्षा कवच विदेशी व्यक्ति या निवारक हिरासत कानून के अन्तर्गत गिरफ्तार व्यक्ति के लिए उपलब्ध नहीं हैं।

उच्चतम न्यायालय ने यह व्यवस्था भी दी कि अनुच्छेद 22 का प्रथम भाग ‘गिरफ्तारी और निरोध’ न्यायालय के आदेश के अंतर्गत गिरफ्तारी, जन-अधिकार गिरफ्तारी, आयकर न देने पर गिरफ्तारी एवं विदेशी के पकड़े जाने पर लागू नहीं होता। इसका प्रयोग केवल आपराधिक क्रियाओं या सरकारी अपराध प्रकृति एवं कुछ प्रतिकूल सार्वजनिक हितों पर हो सकता है।

(ब) अनुच्छेद 22 का दूसरा भाग उन व्यक्तियों को सुरक्षा प्रदान करता है, जिन्हें दंड विषयक कानून के अंतर्गत गिरफ्तार किया गया है। यह सुरक्षा नागरिक एवं विदेशी दौनों के उपलब्ध है। इसमें शामिल हैं

(i) व्यक्ति की हिरासत तीन माह से ज्यादा नहीं बढ़ाई जा सकती, जब तक कि सलाहकार बोर्ड इस बारे में उचित कारण न बताए । बोर्ड में उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश होंगे।

(ii) निरोध का आधार संबंधित व्यक्ति को बताया जाना चाहिए। हालांकि सार्वजनिक हितों के विरुद्ध इसे बताना आवश्यक नहीं है।

(iii) निरोध वाले व्यक्ति को यह अधिकार है कि वह निरोध के आदेश के विरुद्ध अपना प्रतिवेदन करे।

अनुच्छेद 22, संसद को भी यह बताने के लिए अधिकृत करता है कि (अ) किन परिस्थितियों के अधीन और किस वर्ग या वर्गों के मामलों में किसी व्यक्ति को निवारक निरोध का उपबंध करने वाली किसी विधि के अधीन तीन मास से अधिक अवधि के लिए सलाहकार बोर्ड की राय प्राप्त किए बिना विरुद्ध नहीं किया जाएगा।(ख) किसी वर्ग या वर्गों के मामलों में किती अधिकतम अवधि के लिए किसी व्यक्ति को निवारक निरोध का उपबंध करने वाली किसी विधि के अधीन विरुद्ध किया जा सकेगा।(ग)जांच में सलाहकार बोर्ड द्वारा अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया।।

44वें संविधान अधिनियम, 1978 द्वारा निरोध की अवधि को बिना सलाहकार बोर्ड के राय के तीन से दो माह कर दिया गया है। हालांकि यह व्यवस्था अब भी प्रयोग में नहीं आई, जबकि निरोध की मूल अवधि तीन माह की अब भी जारी है।

संविधान ने हिरासत मामले में वैधानिक शक्तियों को संसद एवं विधानमंडल के बीच विभक्त किया है। संसद के पास निवारक निरोध, रक्षा, विदेश मामलों एवं भारत की सरक्षा के संबंध में विशेष अधिकार हैं। संसद एवं विधानमंडल दोनों को आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति सुनिश्चित करने, सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने एवं राज्य की सुरक्षा मामले आदि पर हिरासत संबंधी कानून बनाने का अधिकार है।

निवारक निरोध कानून, जिन्हें संसद द्वारा बनाया गया है:

(i) निवारक निरोध अधिनियम 1950, जो 1969 में समाप्त हो गया।

(ii) आंतरिक सुरक्षा अधिनियम (MISA) 1971, जिसे 1978 में निरसित कर दिया।

(iii) विदेशी मुद्रा का संरक्षण एवं व्यसन निवारण अधिनियम (COFEPOSA) 1974

(iv) राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NASA), 19801

(v) चोरबाजारी रिवारण और आवश्यक वस्तु प्रदाय अधिनियम (PBMSECA), 19801

(vi) आतंकवादी और विध्वंसक क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम (TADA) 1985, यह 1995 में समाप्त हो गया।

(vii) स्वापक औषधि और मनः प्रभावी पदार्थ व्यापार निवारण (PITNDPSA) अधिनियम, 1988।

(viii) आतंकवाद निवारण अधिनियम (POTA) 20021 2004 में इसे निरस्त कर दिया गया।

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि विश्व में कोई भी ऐसा लोकतांत्रिक देश नहीं है, जहां भारत के समान संविधान के अंतरिम भाग में आंतरिक निरोध एवं निवारण संबंधी कानून की पूरी व्यवस्थाएं हों। अमेरिका में तो हैं ही नहीं। ब्रिटेन में इन्हें तब दोबारा रखा गया, जब प्रथम एवं द्वितीय विश्व युद्ध का समय था। भारत में भी ब्रिटिश शासनकाल के समय यह व्यवस्था थी। उदाहरण के लिए बंगाल राज्य कैदी विधेयक, 1818 एवं भारत की सुरक्षा अधिनियम, 1939 में निवारक निरोध की व्यवस्था थी।


1. Prohibition of Traffic in Human Beings and Forced Labour

Article 23 prohibits traffic in human beings, begar (forced labour) and other similar forms of forced labour. Any contravention of this provision shall be an offence punishable in accordance with law. This right is available to both citizens and non-citizens. It protects the individual not only against the State but also against private persons.

The expression ‘traffic in human beings’ include (a) selling and buying of men, women and children like goods; (b) immoral traffic in women and children, including prostitution; (c) devadasis; and (d) slavery. To punish these acts, the Parliament has made the Immoral Traffic (Prevention) Act, 1956.

The term ‘begar ’ means compulsory work without remuneration. It was a peculiar Indian system under which the local zamin-dars sometimes used to force their tenants to render services without any payment. In addition to begar, the Article 23 prohibits other ‘similar forms of forced labour’ like ‘bonded labour’. The term ‘forced labour’ means compelling a person to work against his will. The word ‘force’ includes not only physical or legal force but also force arising from the compulsion of economic circumstances, that is, working for less than the minimum wage. In this regard, the Bonded Labour System (Abolition) Act, 1976; the Minimum Wages Act, 1948; the Contract Labour Act, 1970 and the Equal Remuneration Act, 1976 were made.

Article 23 also provides for an exception to this provision. It permits the State to impose compulsory service for public purposes, as for example, military service or social service, for which it is not bound to pay. However, in imposing such service, the State is not permitted to make any discrimination on grounds only of religion, race, caste or class.

शोषण के विरुद्ध अधिकार

  1. मानव दुर्व्यापार एवं बलात् श्रम का निषेध

अनुच्छेद 23 मानव दुर्व्यापार, बेगार (बलात् श्रम) और इसी प्रकार के अन्य बलात् श्रम के प्रकारों पर भी प्रतिबंध लगाता है। इस व्यवस्था के अंतर्गत कोई भी उल्लंघन कानन के अनुसार दंडनीय होगा। यह अधिकार नागरिक एवं गैर-नागरिक दोनों के लिए उपलब्ध होगा। यह किसी व्यक्ति को न केवल राज्य के खिलाफ बल्कि व्यक्तियों के खिलाफ भी सुरक्षा प्रदान करता है।

‘मानव दुर्व्यापार’ शब्द में शामिल हैं-0 पुरुष, महिला एवं बच्चों की वस्तु के समान खरीद-बिक्री, (i) महिलाओं और बच्चों का अनैतिक दुर्व्यापार, इसमें वेश्यावृत्ति भी शामिल है, (iii) देवदासी और (iv) दास। इस तरह के कृत्यों पर दंडित करने के लिए संसद ने अनैतिक दुर्व्यापार (निवारण) अधिनियम, 1956 बनाया है।

बैगार का अभिप्राय है-बिना परिश्रमिक के काम कराना । यह एक विशिष्ट भारतीय व्यवस्था थी, जिसके तहत क्षेत्रीय जमीदार कभी-कभी अपने नौकरों या उधार लेने वालों से बिना कोई भुगतान किए कार्य कराते थे। अनुच्छेद 23 बेगार के अलावा बलात् श्रम के अन्य प्रकारों, यथा बंधुआ मजदूरी पर भी रोक लगाता है। बलात् श्रम का अर्थ है कि किसी व्यक्ति की इच्छा के विरुद्ध उससे कार्य लेना। बलात् श्रम में केवल शारीरिक अथवा कानूनी बलात् स्थिति ही शामिल नहीं है, बल्कि इसमें आर्थिक परिस्थितियों से उत्पन्न बाध्यता, यथा-न्यूनतम मजदूरी से कम पर काम कराना आदि भी शामिल है। इस संबंध में बंधुआ मजदूरी व्यवस्था (निरसन) अधिनियम, 1976, न्यूनतम मजदूरी अधिनियम 1948 ठेका श्रमिक अधिनियम 1970, और समान पारिश्रमिक अधिनियम, 1976 बनाए गए।

अनुच्छेद 23 में इस उपबंध के अपवाद का भी प्रावधान है। यह राज्य को अनुमति प्रदान करता है कि सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए अनिवार्य सेवा, उदाहरण के लिए सैन्य सेवा एवं सामाजिक सेवा आरोपित कर सकता है, जिनके लिए वह धन देने को बाध्य नहीं है। लेकिन इस तरह की सेवा में लगाने में राज्य को धर्म, जाति या वर्ग के आधार पर भेदभाव की अनुमति नहीं है।

2. Prohibition of Employment of Children in Factories, etc.

Article 24 prohibits the employment of children below the age of 14 years in any factory, mine or other hazardous activities like construction work or railway. But it does not prohibit their employment in any harmless or innocent work.

The Child Labour (Prohibition and Regulation) Act, 1986, is the most important law in this direction. In addition, the Employment of Children Act, 1938; the Factories Act, 1948; the Mines Act, 1952; the Merchant Shipping Act, 1958; the Plantation Labour Act, 1951; the Motor Transport Workers Act, 1951; Apprentices Act, 1961; the Bidi and Cigar Workers Act, 1966; and other similar acts prohibit the employment of children below certain age.

In 1996, the Supreme Court directed the establishment of Child Labour Rehabilitation Welfare Fund in which the offending employer should deposit a fine of ₹20,000 for each child employed by him. It also issued directions for the improvement of education, health and nutrition of children.

The Commissions for Protection of Child Rights Act, 2005 was enacted to provide for the establishment of a National Commission and State Commissions for Protection of Child Rights and Children’s Courts for providing speedy trial of offences against children or of violation of child rights.

In 2006, the government banned the employment of children as domestic servants or workers in business establishments like hotels, dhabas, restaurants, shops, factories, resorts, spas, tea-shops and so on. It warned that anyone employing children below 14 years of age would be liable for prosecution and penal action.

The Child Labour (Prohibition and Regulation) Amendment Act, 2016, amended the Child Labour (Prohibition and Regulation) Act, 1986. It has renamed the Principal Act as the Child and Adolescent Labour (Prohibition and Regulation) Act, 1986.

  1. कारखानों आदि में बालकों के नियोजन का निषेध

अनुच्छेद-24 किसी फैक्ट्री, खान अथवा अन्य परिसंकटमय गतिविधियों यथा निर्माण कार्य अथवा रेलवे में 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के नियोजन का प्रतिषेध करता है, लेकिन यह प्रतिषेध किसी नुकसान न पहुंचाने वाले अथवा निर्दोष कार्यों में नियोजन का प्रतिषेध नहीं करता है।

बाल श्रम (प्रतिषेध एवं नियमन) अधिनियम, 1986 इस दिशा में सर्वाधिक महत्वपूर्ण कानून है। इसके अलावा बालक नियोजन अधिनियम, 1938; कारखाना अधिनियम 1948; खान अधिनियम, 1952; वाणिज्य पोत परिवहन अधिनियम, 19583; बागान श्रम अधिनियम, 1951; मोटर परिवहन कर्मकार अधिनियम 1951; प्रशिक्षु अधिनियम 1961; बीड़ी तथा सिगार कर्मकार अधिनियम 1966 और इसी प्रकार के अन्य अधिनियम निश्चित आयु से कम के बालकों के नियोजन का प्रतिषेध करते हैं।

1996 में उच्चतम न्यायालय ने बाल श्रम पुनर्वास कल्याण कोष की स्थापना का निर्देश दिया, जिसमें बालकों को नियोजित करने वाले द्वारा प्रति बालक 20,000 रुपए जमा कराने का प्रावधान है। इसने बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य एवं पोषण में भी सुधार के लिए निर्देश दिए।

बालक अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम, 2005 बालकों के अधिकारों के संरक्षण के लिए एक राष्ट्रीय आयोग और राज्य आयोगों की स्थापना और बालकों के विरुद्ध अपराधों अथवा बालक अधिकारों के उल्लंघन पर शीघ्र विचारण के लिए अधिनियमित किया गया।

2006 में सरकार ने बच्चों के घरेलू नौकरों के रूप में काम करने पर अथवा व्यावसायिक प्रतिष्ठानों, जैसे-होटलों, रेस्तरां, दुकानों, कारखानों, रिसॉर्ट, स्पा, चाय की दुकानों आदि में नियोजन पर रोक लगा दी है। इसमें 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को नियोजित करने वालों के विरुद्ध अभियोजन और दंडात्मक कार्रवाई की चेतावनी दी गई है।

बाल श्रम संशोधन (2016)

बाल श्रम (निषेध एवं विनियमन) संशोधन अधिनियम, 2016 द्वारा बाल श्रम (निषेध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986 को संशोधित कर दिया। इसने मूल अधिनियम का नाम बदलकर बाल एवं किशोर श्रम (निषेध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986 कर दिया है।

संशोधन अधिनियम 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को सभी व्यवसायों एवं प्रक्रियाओं में रोजगार निषिद्ध करता है। पहले यह निषेध 18 व्यवसायों एवं 65 प्रक्रियाओं पर लागू था।

पुनः संशोधन अधिनियम किशोरों (14 से 18 वर्ष की आयु) को कतिपय खतरनाक व्यवसायों एवं प्रक्रियाओं में रोजगार निषिध करता है।

संशोधन अधिनियम ने उल्लंघन करने वालों के लिए कड़े दंड का भी प्रावधान किया है-6 माह से 2 वर्ष तक की कैद अथवा रु. 20000/- से रु. 50000/- तक का जुर्माना/अपराध दोहराए जाने पर कैद की अवधि 1 से 3 वर्ष की होगी।

RIGHT TO FREEDOM OF RELIGION धर्म की स्वतंत्रता के अधिकार

1. Freedom of Conscience and Free Profession, Practice and Propagation of Religion

Article 25 says that all persons are equally entitled to freedom of conscience and the right to freely profess, practice and propagate religion. The implications of these are:

    1. Freedom of conscience: Inner freedom of an individual to mould his relation with God or Creatures in whatever way he desires.
    2. Right to profess: Declaration of one’s religious beliefs and faith openly and freely.
    3. Right to practice: Performance of religious worship, rituals, ceremonies and exhibition of beliefs and ideas.
    4. Right to propagate: Transmission and dissemination of one’s religious beliefs to others or exposition of the tenets of one’s religion. But, it does not include a right to convert another person to one’s own religion. Forcible conversions impinge on the ‘freedom of conscience’ guaranteed to all the persons alike.

From the above, it is clear that Article 25 covers not only religious beliefs (doctrines) but also religious practices (rituals). Moreover, these rights are available to all persons–citizens as well as noncitizens.

However, these rights are subject to public order, morality, health and other provisions relating to fundamental rights. Further, the State is permitted to:

    1. regulate or restrict any economic, financial, political or other secular activity associated with religious practice; and
    2. provide for social welfare and reform or throw open Hindu religious institutions of a public character to all classes and sections of Hindus.

Article 25 also contains two explanations: one, wearing and carrying of kirpans is to be included in the profession of the Sikh religion; and two, the Hindus, in this context, include Sikhs, Jains and Buddhists.

  1. अंतःकरण की और धर्म के अबाध रूप से मानने, आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता

अनुच्छेद 25 के अनुसार सभी व्यक्तियों को अंत:करण की स्वतंत्रता का और धर्म के अबाध रूप से मानने, आचरण करने और प्रचार करने का समान हक होगा। इसके प्रभाव हैं:

(i) अंत:करण की स्वतंत्रता: किसी भी व्यक्ति को भगवान या उसके रूपों के साथ अपने ढंग से अपने संबंध को बनाने की आंतरिक स्वतंत्रता।

(ii) मानने का अधिकारः अपने धार्मिक विश्वास और आस्था की सार्वजनिक और बिना भय के घोषणा करने का अधिकार।

(iii) आचरण का अधिकारः धार्मिक पूजा, परंपरा, समारोह करने और अपनी आस्था और विचारों के प्रदर्शन की स्वतंत्रता।

(iv) प्रसार का अधिकारः अपनी धार्मिक आस्थाओं का अन्य को प्रचार और प्रसार करना या अपने धर्म के सिद्धांतों को प्रकट करना। परन्तु इसमें किसी व्यक्ति को अपने धर्म में धर्मांतरित करने का अधिकार सम्मिलित नहीं है। जबरदस्ती किया गया धर्मातरण सभी समान व्यक्तियों के लिए सुनिश्चित अंत:करण की स्वतंत्रता का अतिक्रमण करता है।

उपरोक्त प्रावधानों से यह स्पष्ट है कि अनुच्छेद 25 केवल धार्मिक विश्वास को ही नहीं, बल्कि धार्मिक आचरणों को भी समाहित करता है। यह अधिकार सभी व्यक्तियों नागरिकों एवं गैर-नागरिकों सबके लिए उपलब्ध हैं।

यद्यपि ये अधिकार सार्वजनिक व्यवस्थाओं, नैतिकता, स्वास्थ्य एवं मूल अधिकारों से संबंधित अन्य प्रावधनों के अनुसार हैं । राज्य को इस बात की अनुमति देता है: (अ) धार्मिक आचरण से संबंद्ध किसी आर्थिक, वित्तीय, राजनीतिक या अन्य लौकिक क्रियाकलाप का विनियमन या निबंधन करे।

(ब) सामाजिक कल्याण और सुधार के लिए या सार्वजनिक प्रकार की हिन्दुओं की धार्मिक संस्थाओं को हिन्दुओं के सभी वर्गों और अनुभागों के लिए खोलना।

अनुच्छेद 25 में दो व्याख्याएं भी की गई हैं-पहला, कृपाण धारण करना और लेकर चलना सिख धर्म के मानने का अंग समझा जाएगा, और दूसरा इस संदर्भ में हिन्दुओं में सिख, जैन और बौद्ध सम्मिलित हैं।”

2. Freedom to Manage Religious Affairs

According to Article 26, every religious denomination or any of its section shall have the following rights:

    1. Right to establish and maintain institutions for religious and charitable purposes;
    2. Right to manage its own affairs in matters of religion;
    3. Right to own and acquire movable and immovable property; and
    4. Right to administer such property in accordance with law.

Article 25 guarantees rights of individuals, while Article 26 guarantees rights of religious denominations or their sections. In other words, Article 26 protects collective freedom of religion. Like the rights under Article 25, the rights under Article 26 are also subject to public order, morality and health but not subject to other provisions relating to the Fundamental Rights.

The Supreme Court held that a religious denomination must satisfy three conditions:

    1. It should be a collection of individuals who have a system of beliefs (doctrines) which they regard as conducive to their spiritual well-being;
    2. It should have a common organisation; and
    3. It should be designated by a distinctive name.

Under the above criteria, the Supreme Court held that the ‘Ramakrishna Mission’ and ‘Ananda Marga’ are religious denominations within the Hindu religion. It also held that Aurobindo Society is not a religious denomination.

  1. धार्मिक कार्यों के प्रबंध की स्वतंत्रता

अनुच्छेद 26 के अनुसार, प्रत्येक धार्मिक संप्रदाय या उसके किसी अनुभाग को निम्नलिखित अधिकार प्राप्त होंगे:

(i) धार्मिक एवं मूर्त प्रयोजनों के लिए संस्थाओं की स्थापना और पोषण का अधिकार;

(ii) अपने धर्म विषयक कार्यों का प्रबंध करने का अधिकार;

(iii) जंगम और स्थावर संपत्ति के अर्जन और स्वामित्व का अधिकार, और;

(iv) ऐसी संपत्ति का विधि के अनुसार प्रशासन करने का अधिकार।

अनुच्छेद 25 जहां व्यक्तिगत अधिकारों की गारंटी देता है, वहीं अनुच्छेद 26 धार्मिक संप्रदाय या इसके अनुभागों को अधिकार प्रदान करता है। दूसरे शब्दों में, अनुच्छेद 26 सामूहिक धार्मिक रूप से अधिकारों की रक्षा करता है। अनुच्छेद 25 की तरह ही, अनुच्छेद 26 भी सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता एवं स्वास्थ्य संबंधी अधिकार देता है लेकिन मूल अधिकारों से संबंधित अन्य प्रावधानों में नहीं।

उच्चतम न्यायालय ने व्यवस्था दी है कि धार्मिक संप्रदायों को तीन शर्ते पूरी करनी चाहिए:

(i) यह व्यक्तियों का समूह होना चाहिए, जिनका विश्वास तंत्र उनके अनुसार उनकी आत्मिक तुष्टि के लिए अनुकूल हो।

(ii) इनका एक सामान्य संगठन होना चाहिए एवं

(iii) इसका एक विशिष्ट नाम होना चाहिए।

उपरोक्त मामले के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय ने व्यवस्था दी कि ‘रामकृष्ण मिशन’ और ‘आनन्द मार्ग’ हिंदू धर्म के अंतर्गत धार्मिक संप्रदाय हैं। उच्चतम न्यायालय ने यह भी कहा था कि अरविंदो सोसाइटी धार्मिक संप्रदाय नहीं है।

3. Freedom from Taxation for Promotion of a Religion

Article 27 lays down that no person shall be compelled to pay any taxes for the promotion or maintenance of any particular religion or religious denomination. In other words, the State should not spend the public money collected by way of tax for the promotion or maintenance of any particular religion. This provision prohibits the State from favouring, patronising and supporting one religion over the other. This means that the taxes can be used for the promotion or maintenance of all religions.

This provision prohibits only levy of a tax and not a fee. This is because the purpose of a fee is to control secular administration of religious institutions and not to promote or maintain religion. Thus, a fee can be levied on pilgrims to provide them some special service or safety measures. Similarly, a fee can be levied on religious endowments for meeting the regulation expenditure.

  1. धर्म की अभिवृद्धि के लिए करों के संदाय से स्वतंत्रता

अनुच्छेद 27 में उल्लिखित है कि किसी भी व्यक्ति को किसी विशिष्ट धर्म या धर्मिक संप्रदाय की अभिवृद्धि या पोषण में व्यय करने के लिए करों के संदाय हेतु बाध्य नहीं किया जाएगा। दूसरे शब्दों में, राज्य कर के रूप में एकत्रित धन को किसी विशिष्ट धार्मिक उत्थान एवं रख-रखाव के लिए व्यय नहीं कर सकता है। यह व्यवस्था राज्य को किसी धर्म का दूसरे के मकाबले पक्ष लेने से रोकता है। इसका अर्थ यह हुआ कि करों का प्रयोग सभी धर्मों के रख-रखाव एवं उन्नति के लिए किया जा सकता है। यह व्यवस्था केवल कर की उगाही पर रोक लगाती है, न कि शुल्क पर।

ऐसा इसलिए क्योंकि शुल्क लगाने का उद्देश्य धार्मिक संस्थानों पर धर्म निरपेक्ष प्रशासन के पक्ष में नियंत्रण लगाना है। इस तरह तीर्थ यात्रियों से शुल्क की उगाही की जा सकती है। ताकि उन्हें कुछ विशेष सुविधाएं एवं सुरक्षा मुहैया कराई जा सके। इसी तरह धार्मिक कार्यकलापों और उनके खर्च के नियमितीकरण पर भी शुल्क लगाया जा सकता है।

4. Freedom from Attending Religious Instruction

Under Article 28, no religious instruction shall be provided in any educational institution wholly maintained out of State funds. However, this provision shall not apply to an educational institution administered by the State but established under any endowment or trust, requiring imparting of religious instruction in such institution.

Further, no person attending any educational institution recognised by the State or receiving aid out of State funds shall be required to attend any religious instruction or worship in that institution without his consent. In case of a minor, the consent of his guardian is needed.

Thus, Article 28 distinguishes between four types of educational institutions:

    1. Institutions wholly maintained by the State.
    2. Institutions administered by the State but established under any endowment or trust.
    3. Institutions recognised by the State.
    4. Institutions receiving aid from the State.

In (a), religious instruction is completely prohibited while in (b), religious instruction is permitted. In (c) and (d), religious instruction is permitted on a voluntary basis.

  1. धार्मिक शिक्षा में उपस्थित होने से स्वतंत्रता

अनुच्छेद 28 के अंतर्गत राज्य-निधि से पूर्णत: पोषित किसी शिक्षा संस्था में कोई धार्मिक शिक्षा न दी जाए। हालांकि यह व्यवस्था उन संस्थानों में लागू नहीं होती, जिनका प्रशासन तो राज्य कर रहा हो लेकिन उसकी स्थापना किसी विन्यास या न्यास के अधीन हुई हो।

राज्य से मान्यता प्राप्त या राज्य-निधि से सहायता पाने के लिए शिक्षा संस्था में उपस्थित होने वाले किसी व्यक्ति को ऐसी संस्था में दी जाने वाली धार्मिक शिक्षा या उपासना में भाग लेने के लिए उसकी अपनी सहमति के बिना बाध्य नहीं किया जाएगा। अवयस्क के मामले में उसके संरक्षक की सहमति की आवश्यकता होगी।

इस तरह अनुच्छेद 28 चार प्रकार की शैक्षणिक संस्थानों में विभेद करता है:

(i) ऐसे संस्थान, जिनका पूरी तरह रख-रखाव राज्य करता है।

(ii) ऐसे संस्थान, जिनका प्रशासन राज्य करता है लेकिन उनकी स्थापना किसी विन्यास या न्यास के तहत हो।

(iii) राज्य द्वारा मान्यता प्राप्त संस्थान।

(iv) ऐसे संस्थान, जो राज्य द्वारा वित्त सहायता प्राप्त कर रहे हों।

प्रावधान (i) में धार्मिक निर्देश पूरी तरह प्रतिबंधित हैं, जबकि (ii) में धार्मिक शिक्षा की अनुमति है। (iii) और (iv) में स्वैच्छिक आधार पर धार्मिक शिक्षा की अनुमति है।

CULTURAL AND EDUCATIONAL RIGHTS संस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकार

1. Protection of Interests of Minorities

Article 29 provides that any section of the citizens residing in any part of India having a distinct language, script or culture of its own, shall have the right to conserve the same. Further, no citizen shall be denied admission into any educational institution maintained by the State or receiving aid out of State funds on grounds only of religion, race, caste, or language.

The first provision protects the right of a group while the second provision guarantees the right of a citizen as an individual irrespective of the community to which he belongs.

Article 29 grants protection to both religious minorities as well as linguistic minorities. However, the Supreme Court held that the scope of this article is not necessarily restricted to minorities only, as it is commonly assumed to be. This is because of the use of words ‘section of citizens’ in the Article that include minorities as well as majority.

The Supreme Court also held that the right to conserve the language includes the right to agitate for the protection of the language. Hence, the political speeches or promises made for the conservation of the language of a section of the citizens does not amount to corrupt practice under the Representation of the People Act, 1951.

  1. अल्पसंख्यकों के हितों का संरक्षण

अनुच्छेद 29 यह उपबंध करता है कि भारत के किसी भी भाग में रहने वाले नागरिकों के किसी भी अनुभाग को जिसकी अपनी बोली, भाषा, लिपि, संस्कृति को सुरक्षित रखने का अधिकार है। इसके अतिरिक्त, किसी भी नागरिक को राज्य के अंतर्गत आने वाले संस्थान या उससे सहायता प्राप्त संस्थान में धर्म, जाति या भाषा के आधार पर प्रवेश से रोका नहीं जा सकता।

पहली व्यवस्था एक समूह के अधिकारों की रक्षा करती है, जबकि दूसरी व्यवस्था नागरिक के व्यक्तिगत सम्मान की रक्षा करती है फिर चाहे वह किसी भी समुदाय से संबद्ध हो।

अनुच्छेद 29, धार्मिक अल्पसंख्यकों एवं भाषायी अल्पसंख्यकों को सुरक्षा प्रदान करता है। हालांकि उच्चतम न्यायालय ने व्यवस्था दी है कि इस अनुच्छेद की व्यवस्था केवल अल्पसंख्यकों के मामले में ही नहीं, जैसा कि सामान्यतः माना जाता है, क्योंकि ‘नागरिकों के अनुभाग’ शब्द का अभिप्राय अल्पसंख्यक एवं बहुसंख्यक दोनों से है।

उच्चतम न्यायालय ने यह व्यवस्था भी दी है कि भाषा की रक्षा में भाषा के संरक्षण हेतु आंदोलन करने का अधिकार भी सम्मिलित है। अतः नागरिकों के एक अनुभाग की भाषा के संरक्षण हेतु राजनीतिक भाषण या वादे जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 का उल्लंघन नहीं करते हैं।

2. Right of Minorities to Establish and Administer Educational Institutions

Article 30 grants the following rights to minorities, whether religious or linguistic:

    1. All minorities shall have the right to establish and administer educational institutions of their choice.
    2. The compensation amount fixed by the State for the compulsory acquisition of any property of a minority educational institution shall not restrict or abrogate the right guaranteed to them. This provision was added by the 44th Amendment Act of 1978 to protect the right of minorities in this regard. The Act deleted the right to property as a Fundamental Right (Article 31).
    3. In granting aid, the State shall not discriminate against any educational institution managed by a minority.

Thus, the protection under Article 30 is confined only to minorities (religious or linguistic) and does not extend to any section of citizens (as under Article 29). However, the term ‘minority’ has not been defined anywhere in the Constitution.

The right under Article 30 also includes the right of a minority to impart education to its children in its own language.

Minority educational institutions are of three types:

    1. institutions that seek recognition as well as aid from the State;
    2. institutions that seek only recognition from the State and not aid; and
    3. institutions that neither seek recognition nor aid from the State.

The institutions of first and second type are subject to the regulatory power of the state with regard to syllabus prescription, academic standards, discipline, sanitation, employment of teaching staff and so on. The institutions of third type are free to administer their affairs but subject to operation of general laws like contract law, labour law, industrial law, tax law, economic regulations, and so on.

In a judgement delivered in the Secretary of Malankara Syrian Catholic College case (2007), the Supreme Court has summarized the general principles relating to establishment and administration of minority educational institutions in the following way :

  1. The right of minorities to establish and administer educational institutions of their choice comprises the following rights :
    1. To choose its governing body in whom the founders of institution have faith and confidence to conduct and manage affairs of the institution;
    2. To appoint teaching staff (teachers/ lecturers and he masters/principals) as also non-teaching staff; and to take action if there is dereliction of duty on the part of any of its employees
    3. To admit eligible students of their choice and to set u reasonable fee structure; and
    4. To use its properties and assets for the benefit of the institution
  1. The right conferred on minorities under Article 30 is only to ensure equality with the majority and not intended to place the minorities in a more advantageous position vis-a-vis the majority. There is no reverse discrimination in favour of minorities. The general laws of the land relating to national interest, national security, social welfare, public order, morality, health, sanitation, taxation etc., applicable to all, will equally apply to minority institutions also.
  2. The right to establish and administer educational institutions is not absolute. Nor does it include the right to maladminister. There can be regulatory measures for ensuring educational character and standards and maintaining academic excellence. There can be checks on administration as are necessary to ensure that the administration is efficient and sound, so as to serve the academic needs of the institution. Regulations made by the State concerning generally the welfare of students and teachers, regulations laying down eligibility criteria and qualifications for appointment, as also conditions of service of employees (both teaching and non-teaching), regulations to prevent exploitation or oppression of employees, and regulations prescribing syllabus and curriculum of study fall under this category. Such regulations do not in any manner interfere with the right under Article 30(1).
  3. Subject to the eligibility conditions/ qualifications prescribed by the State being met, the unaided minority educational institutions will have the freedom to appoint teachers/lecturers by adopting any rational procedure of selection.
  4. Extention of aid by the State, does not alter the nature and character of the minority educational institutions. The conditions can be imposed by the State to ensure proper utilization of the aid, without however diluting or abridging the right under Article 30(1).
  1. शिक्षा संस्थानों की स्थापना और प्रशासन करने का अल्पसंख्यक वर्गों का अधिकार

अनुच्छेद 30 अल्पसंख्यकों, चाहे धार्मिक या भाषायी, को निम्नलिखित अधिकार प्रदान करता है:

(i) सभी अल्पसंख्यकों वर्गों को अपनी रुचि की शिक्षा संस्थाओं की स्थापना और प्रशासन का अधिकार होगा।

(ii) राज्य द्वारा अल्पसंख्यक वर्ग शिक्षा संस्था की किसी संपत्ति के अनिवार्य अर्जन के लिए निर्धारित क्षतिपूर्ति रकम से उनके लिए प्रत्याभूत अधिकार निबंधित या निराकृत नहीं होंगे। इस उपबंध 1978 के 44वें संशोधन अधिनियम द्वारा जोड़ा गया। इस अधिनियम ने संपत्ति के अधिकार को मूल अधिकार (अनुच्छेद) से निरसित कर दिया।

(iii) राज्य आर्थिक सहायता में अल्पसंख्यकों द्वारा प्रबंधित संस्थानों में विभेद नहीं करेगा।

इस तरह अनुच्छेद 30 के अल्पसंख्यकों (धार्मिक एवं भाषायी) की सुरक्षा का विस्तार नागरिकों के किसी अन्य अनुभाग के लिए (जैसा कि अनुच्छेद 29) नहीं है। हालांकि अल्पसंख्यक’ शब्द को संविधान में कहीं भी परिभाषित नहीं किया गया है।

अनुच्छेद 30 के अंतर्गत उल्लिखित अधिकार, अल्पसंख्यकों को अपने बच्चों को अपनी भाषा में शिक्षा का अधिकार भी प्रदान करता है।

अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थाएं तीन प्रकार की होती हैं:

(i) राज्य से आर्थिक सहायता एवं मान्यता लेने वाले संस्थान।

(ii) ऐसे संस्थान, जो राज्य से मान्यता लेते हैं, लेकिन उन्हें आर्थिक सहायता प्राप्त नहीं होती।

(iii) ऐसे संस्थान, जो राज्य से मान्यता या सहायता नहीं लेते।

पहले एवं दूसरे प्रकार के संस्थानों में राज्य के अनुसार शिक्षण, स्टाफ, पाठ्यक्रम, शैक्षणिक मानक, अनुशासन, सफाई व्यवस्था होगी। तीसरे प्रकार के संस्थान प्रशासनिक मामलों में स्वतंत्र परन्तु सामान्य कानून हैं, जैसे-ठेका कानून, श्रम कानून, औद्योगिक कानून, कर कानून, आर्थिक विनियम आदि आवश्यक है।

सेक्रेटरी ऑफ मलनकारा सीरियन कैथोलिक कॉलेज केस (2007) के फैसले में, सर्वोच्च न्यायालय ने अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थानों की स्थापना तथा प्रशासन से सम्बन्धित सामान्य सिद्धांतों को निम्नलिखित रूप में प्रस्तुत किया है:

  1. शैक्षिक संस्थानों को स्थापना एवं प्रशासन करने के अल्पसंख्यकों के अधिकार के अंतर्गत निम्नलिखित अधिकार शामिल हैं:

(i) अपना शासी निकाय (Governing body) चुनने का अधिकार जिसमें संस्थापकों का भरोसा हो कि वह संस्थान को भली-भांति चला सकेगा।

(ii) शिक्षण कर्मचारियों (शिक्षक/व्याख्याता तथा प्रधानाध्यापक/प्राचार्य) तथा शिक्षकेतर कर्मचारियों को नियुक्त करने, साथ ही कर्तव्य में लापरवाही बरतने पर उनके विरुद्ध कार्रवाई करने का अधिकार।

(iii) अपनी पसंद के अर्ह विद्यार्थियों को प्रवेश दिलाने तथा एक सुसंगत शुल्क-ढांचा स्थापित करने का अधिकार।

(iv) अपनी सम्पदा तथा परिसम्पत्तियों का संस्थान के हित में उपयोग करने का अधिकार।

2. अनुच्छेद 30 के अंतर्गत अल्पसंख्यकों को मिले अधिकार केवल बहुसंख्यकों के साथ समानता स्थापित करने के लिए है, न कि इसलिए कि अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यकों के मुकाबले अधिक लाभ की स्थिति में रख दिया जाए। अल्पसंख्यकों के पक्ष में किसी भी प्रकार का विपरीत भेदभाव (Reverse discrimination) नहीं है। देश का सामान्य कानून जो राष्ट्रीय हित, राष्ट्रीय सुरक्षा, समाज कल्याण, सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता, स्वास्थ्य, स्वच्छता, कराधान इत्यादि से सम्बन्धित है जो सब पर लागू होता है, अल्पसंख्यक संस्थानों पर भी लागू होगा।

3. अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थाओं की स्थापना एवं प्रशासन का अधिकार सम्पूर्ण या अबाध नहीं है। न ही इसके अंतर्गत कुप्रबंधन शामिल है। शैक्षिक चरित्र तथा मानक एवं अकादेमिक उत्कृष्टता सुनिश्चित करने के लिए विनियामक उपाय किए जा सकते हैं। प्रशासन पर भी नियंत्रित किया जा सकता है अगर उसे कार्यकुशल एवं मजबूत बनाने की आवश्यकता हो ताकि संस्थान की अकादेमिक आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके। राज्य द्वारा विद्यार्थियों एवं शिक्षकों के कल्याण से सम्बन्धित नियम नियुक्ति के लिए अर्हता एवं योग्यता के निर्धारण के लिए नियम साथ ही कर्मचारियों की सेवा शर्तों (शैक्षिक एवं शिक्षाकेतर दोनों) के लिए नियम, कर्मचारियों का शोषण उत्पीड़न रोकने के लिए नियम, तथा पाठ्यक्रम एवं पाठ्यचर्या निर्धारित करने के लिए नियम इस कोटि में आते हैं। ऐसे नियम-उपनियम किसी भी प्रकार अनुच्छेद-30 (1) के अंतर्गत प्राप्त अधिकारों में रखने नहीं देते।

4. राज्य द्वारा निर्धारित अर्हता शर्तो योग्यताओं का पालन किए जाने की शर्त पर, अनुदान रहित अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थानों को शिक्षक/व्याख्याता की नियुक्ति युक्तियुक्त व्यय पद्धति के अनुसार करने की स्वतंत्रता होगी।

5. राज्य द्वारा सहायता के विस्तार से अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों की प्रकृति एवं चरित्र नहीं बदलता। राज्य की ओर से सहायता राशि के समुचित उपयोग की शर्त रखी जा सकती है लेकिन अनुच्छेद 30(1) में प्रदत्त अधिकारों को बिना शिथिल किए।


A mere declaration of fundamental rights in the Constitution is meaningless, useless and worthless without providing an effective machinery for their enforcement, if and when they are violated. Hence, Article 32 confers the right to remedies for the enforcement of the fundamental rights of an aggrieved citizen. In other words, the right to get the Fundamental Rights protected is in itself a fundamental right. This makes the fundamental rights real. That is why Dr. Ambedkar called Article 32 as the most important article of the Constitution–‘an Article without which this constitution would be a nullity. It is the very soul of the Constitution and the very heart of it’. The Supreme Court has ruled that Article 32 is a basic feature of the Constitution. Hence, it cannot be abridged or taken away even by way of an amendment to the Constitution. It contains the following four provisions:

  1. The right to move the Supreme Court by appropriate proceedings for the enforcement of the Fundamental Rights is guaranteed.
  2. The Supreme Court shall have power to issue directions or orders or writs for the enforcement of any of the fundamental rights. The writs issued may include habeas corpus, mandamus, prohibition, certiorari and quo-warranto.
  3. Parliament can empower any other court to issue directions, orders and writs of all kinds. However, this can be done without prejudice to the above powers conferred on the Supreme Court. Any other court here does not include high courts because Article 226 has already conferred these powers on the high courts.
  4. The right to move the Supreme Court shall not be suspended except as otherwise provided for by the Constitution. Thus the Constitution provides that the President can suspend the right to move any court for the enforcement of the fundamental rights during a national emergency (Article 359).

It is thus clear that the Supreme Court has been constituted as the defender and guarantor of the fundamental rights of the citizens. It has been vested with the ‘original’ and ‘wide’ powers for that purpose. Original, because an aggrieved citizen can directly go to the Supreme Court, not necessarily by way of appeal. Wide, because its power is not restricted to issuing of orders or directions but also writs of all kinds.

The purpose of Article 32 is to provide a guaranteed, effective, expeditious, inexpensive and summary remedy for the protection of the fundamental rights. Only the Fundamental Rights guaranteed by the Constitution can be enforced under Article 32 and not any other right like non-fundamental constitutional rights, statutory rights, customary rights and so on. The violation of a fundamental right is the sine qua non for the exercise of the right conferred by Article 32. In other words, the Supreme Court, under Article 32, cannot determine a question that does not involve Fundamental Rights. Article 32 cannot be invoked simply to determine the constitutionality of an executive order or a legislation unless it directly infringes any of the fundamental rights.

In case of the enforcement of Fundamental Rights, the jurisdiction of the Supreme Court is original but not exclusive. It is concurrent with the jurisdiction of the high court under Article 226. It vests original powers in the high court to issue directions, orders and writs of all kinds for the enforcement of the Fundamental Rights. It means when the Fundamental Rights of a citizen are violated, the aggrieved party has the option of moving either the high court or the Supreme Court directly.

Since the right guaranteed by Article 32 (ie, the right to move the Supreme Court where a fundamental right is infringed) is in itself a fundamental right, the availability of alternate remedy is no bar to relief under Article 32. However, the Supreme Court has ruled that where relief through high court is available under Article 226, the aggrieved party should first move the high court.

संवैधानिक उपचारों का अधिकार

मूल अधिकारों की संवैधानिक घोषणा तब तक अर्थहीन. तर्कहीन एवं शक्तिविहीन है, जब तक कि कोई प्रभावी मशीनरी उसे लागू करने के लिए न हो। इस तरह अनुच्छेद 32 संवैधानिक उपचार का अधिकार प्रदान करता है। दूसरे शब्दों में, मूल अधिकारों के संरक्षण का अधिकार स्वयं में ही मूल अधिकार है। यही व्यवस्था, मूल अधिकारों को वास्तविक बनाती है। इसीलिए डॉ. अंबेडकर ने अनुच्छेद 32 को संविधान का सबसे महत्वपूर्ण अनुच्छेद बताया, “एक अनुच्छेद जिसके बिना संविधान अर्थविहीन है, यह संविधान की आत्मा और हदय है।” उच्चतम न्यायालय ने व्यवस्था दी है कि अनुच्छेद 32 में संविधान की मूल विशेषताएं हैं। इस तरह इसे संविधान संशोधन के तहत बदला नहीं जा सकता। इसमें निम्नलिखित चार प्रावधान हैं:

(अ) मूल अधिकारों को प्रवर्तित कराने के लिए समुचित कार्यवाहियों द्वारा उच्चतम न्यायालय में समावेदन करने का अधिकार प्रत्याभूत है।

(ब) उच्चतम न्यायालय को किसी भी मूल अधिकार के संबंध में निर्देश या आदेश जारी करने का अधिकार होगा। उसके द्वारा जारी रिट में शामिल हैं, बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, उत्प्रेषण एवं अधिकार पृच्छा।

(स) संसद को यह शक्ति प्राप्त है कि वह किसी अन्य न्यायालय सभी प्रकार के निर्देश, आदेश और रिट जारी करने की शक्ति प्रदान करे। यद्यपि यह उच्चतम न्यायालय को प्रदत्त शक्तियों के विरुद्ध किसी पूर्वाग्रह से रहित होना चाहिए। यहां कोई अन्य न्यायालय उच्च न्यायालय सहित शामिल नहीं है। अनुच्छेद 226 पहले ही निर्धारित करता है कि ये शक्तियां उच्च न्यायालय में निहित हैं।

(द) उच्चतम न्यायालय में जाने के अधिकार को इस संविधान द्वारा अन्यथा उपबंधित के सिवाएं निलंबित नहीं किया जाएगा। इस तरह राष्ट्रपति राष्ट्रीय आपातकाल (अनुच्छेद 359) के तहत इनको स्थगित कर सकता है।

इस तरह यह स्पष्ट है कि उच्चतम न्यायालय नागरिकों के मूल अधिकारों का रक्षक एवं गारंटी देने वाला है। इसे इस प्रयोजन हेतु मूल और विस्तृत शक्तियां प्राप्त हैं। अधिकारों के हनन पर कोई व्यक्ति बिना अपीली प्रक्रिया के उच्चतम न्यायालय में जा सकता है। विस्तृत इसलिए क्योंकि इसकी शक्तियां केवल आदेश या निदेश देने तक सीमित नहीं है, यह सभी प्रकार की रिटें जारी कर सकता है।

अनुच्छेद 32 का उद्देश्य मूल अधिकारों के संरक्षण हेतु गारंटी, प्रभावी, सुलभ और संक्षेप उपचारों की व्यवस्था है । संविधान द्वारा अनुच्छेद 32 के अंतर्गत केवल मूल अधिकारों की ही गारंटी दी गई है, अन्य अधिकारों की नहीं, जैसे-गैर मूल संवैधानिक अधिकार, असंवैधानिक अधिकार, लौकिक अधिकार आदि। अनुच्छेद 32 के अनुसार, मूल अधिकारों का हनन इसके प्रयोग की अनिवार्य शर्त है। दूसरे शब्दों में, अनुच्छेद 32 के तहत उच्चतम न्यायालय, मूल अधिकारों संबंधित मामलों पर प्रश्न नहीं उठा सकता । अनुच्छेद 32 केवल इसलिए प्रयुक्त नहीं किया जा सकता कि केवल कार्यपालिका आदेश या विधायिका की सांविधानिकता का निर्धारण किया जा सके। इसे किसी मूल अधिकार के सीधे हनन में ही प्रयुक्त किया जा सकता है।

मूल अधिकारों के क्रियान्वयन के बारे में उच्चतम न्यायालय का न्यायिक क्षेत्र मूल तो है पर अनन्य नहीं। उसका जुड़ाव अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय के न्यायिक क्षेत्र से है । इस तरह उच्च न्यायालय की मूल शक्तियों में निर्देश जारी करना, आदेश एवं रिट जारी करना मूल अधिकारों का क्रियान्वयन आदि आता है। इसका अर्थ है कि जब किसी नागरिक के मूल अधिकारों का हनन होता है तो संबंधित पक्ष के पास या तो उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय में सीधे जाने का विकल्प होता है।

अनुच्छेद 32 द्वारा प्रदत्त अधिकार स्वयं ही मूल अधिकार है (मूल अधिकारों का हनन होने पर उच्चतम न्यायालय में जाने का अधिकार)। इस तरह अनुच्छेद 32 के तहत वैकल्पिक उपचार आदि पर कोई रोक नहीं है। उच्चतम न्यायालय ने व्यवस्था दी कि जब अनुच्छेद 226 के तहत संबंधित दल के पास उच्च न्यायालय के माध्यम से राहत का विकल्प मौजूद है, तो उसे पहले उच्च न्यायालय ही जाना चाहिए।


The Supreme Court (under Article 32) and the high courts (under Article 226) can issue the writs of habeas corpus, mandamus, prohibition, certiorari and quo-warranto. Further, the Parliament (under Article 32) can empower any other court to issue these writs. Since no such provision has been made so far, only the Supreme Court and the high courts can issue the writs and not any other court. Before 1950, only the High Courts of Calcutta, Bombay and Madras had the power to issue the writs. Article 226 now empowers all the high courts to issue the writs.

These writs are borrowed from English law where they are known as ‘prerogative writs’. They are so called in England as they were issued in the exercise of the prerogative of the King who was, and is still, described as the ‘fountain of justice’. Later, the high court started issuing these writs as extraordinary remedies to uphold the rights and liberties of the British people.

The writ jurisdiction of the Supreme Court differs from that of a high court in three respects:

  1. The Supreme Court can issue writs only for the enforcement of fundamental rights whereas a high court can issue writs not only for the enforcement of Fundamental Rights but also for any other purpose. The expression ‘for any other purpose’ refers to the enforcement of an ordinary legal right. Thus, the writ jurisdiction of the Supreme Court, in this respect, is narrower than that of high court.
  2. The Supreme Court can issue writs against a person or government throughout the territory of India whereas a high court can issue writs against a person residing or against a government or authority located within its territorial jurisdiction only or outside its territorial jurisdiction only if the cause of action arises within its territorial jurisdiction.15 Thus, the territorial jurisdiction of the Supreme Court for the purpose of issuing writs is wider than that of a high court.
  3. A remedy under Article 32 is in itself a Fundamental Right and hence, the Supreme Court may not refuse to exercise its writ jurisdiction. On the other hand, a remedy under Article 226 is discretionary and hence, a high court may refuse to exercise its writ jurisdiction. Article 32 does not merely confer power on the Supreme Court as Article 226 does on a high court to issue writs for the enforcement of fundamental rights or other rights as part of its general jurisdiction. The Supreme Court is thus constituted as a defender and guarantor of the fundamental rights.

Now, we will proceed to understand the meaning and scope of different kinds of writs mentioned in Articles 32 and 226 of the Constitution:

Habeas Corpus

It is a Latin term which literally means ‘to have the body of’. It is an order issued by the court to a person who has detained another person, to produce the body of the latter before it. The court then examines the cause and legality of detention. It would set the detained person free, if the detention is found to be illegal. Thus, this writ is a bulwark of individual liberty against arbitrary detention.

The writ of habeas corpus can be issued against both public authorities as well as private individuals. The writ, on the other hand, is not issued where the (a) detention is lawful, (b) the proceeding is for contempt of a legislature or a court, (c) detention is by a competent court, and (d) detention is outside the jurisdiction of the court.


It literally means ‘we command’. It is a command issued by the court to a public official asking him to perform his official duties that he has failed or refused to perform. It can also be issued against any public body, a corporation, an inferior court, a tribunal or government for the same purpose.

The writ of mandamus cannot be issued (a) against a private individual or body; (b) to enforce departmental instruction that does not possess statutory force; (c) when the duty is discretionary and not mandatory; (d) to enforce a contractual obligation; (e) against the president of India or the state governors; and (f) against the chief justice of a high court acting in judicial capacity.


Literally, it means ‘to forbid’. It is issued by a higher court to a lower court or tribunal to prevent the latter from exceeding its jurisdiction or usurping a jurisdiction that it does not possess. Thus, unlike mandamus that directs activity, the prohibition directs inactivity.

The writ of prohibition can be issued only against judicial and quasijudicial authorities. It is not available against administrative authorities, legislative bodies, and private individuals or bodies.


In the literal sense, it means ‘to be certified’ or ‘to be informed’. It is issued by a higher court to a lower court or tribunal either to transfer a case pending with the latter to itself or to squash the order of the latter in a case. It is issued on the grounds of excess of jurisdiction or lack of jurisdiction or error of law. Thus, unlike prohibition, which is only preventive, certiorari is both preventive as well as curative.

Previously, the writ of certiorari could be issued only against judicial and quasi-judicial authorities and not against administrative authorities. However, in 1991, the Supreme Court ruled that the certiorari can be issued even against administrative authorities affecting rights of individuals.

Like prohibition, certiorari is also not available against legislative bodies and private individuals or bodies.


In the literal sense, it means ‘by what authority or warrant’. It is issued by the court to enquire into the legality of claim of a person to a public office. Hence, it prevents illegal usurpation of public office by a person.

The writ can be issued only in case of a substantive public office of a permanent character created by a statute or by the Constitution. It cannot be issued in cases of ministerial office or private office.

Unlike the other four writs, this can be sought by any interested person and not necessarily by the aggrieved person.

रिट-प्रकार एवं क्षेत्र

उच्चतम न्यायालय (अनुच्छेद 32 के तहत) एवं उच्च न्यायालय (अनुच्छेद 226 के तहत) रिट जारी कर सकते हैं। ये हैं-बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, उत्प्रेषण एवं अधिकार पृच्छा। संसद (अनुच्छेद 32 के तहत) किसी अन्य न्यायालय को भी इन – रिटों को जारी करने का अधिकार दे सकती है, चूंकि अभी तक ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। केवल उच्चतम एवं उच्च न्यायालय ही रिट जारी कर सकते हैं कोई अन्य न्यायालय नहीं। 1950 से पहले केवल कलकत्ता, बंबई एवं मद्रास उच्च न्यायालय को ही रिट जारी करने का अधिकार प्राप्त था। अनुच्छेद, 226 अब सभी उच्च न्यायालयों को रिट जारी करने की शक्ति प्रदान करता है।

 ये रिट, अंग्रेजी कानून से लिए गए हैं, जहां इन्हें विशेषाधिकार रिट’ कहा जाता था। इन्हें राजा द्वारा जारी किया जाता है, जिन्हें अब भी ‘न्याय का झरना’ कहा जाता है। आगे चलकर उच्च न्यायालय नै रिट जारी करना प्रारंभ कर दिया। ये रिट ब्रिटिश लोगों के अधिकारों और स्वतंत्रता को कायम रखने के लिए असाधारण उपचार थीं।

उच्चतम न्यायालय का रिट संबंधी न्यायिक क्षेत्र उच्च न्यायालय से तीन प्रकार से भिन्न हैं:

1. उच्चतम न्यायालय केवल मूल अधिकारों के क्रियान्वयन को लेकर रिट जारी कर सकता है, जबकि उच्च न्यायालय इनके अलावा किसी और उद्देश्य को लेकर भी इसे जारी कर सकते हैं। ‘किसी अन्य उद्देश्य’ शब्द का अभिप्राय किसी सामान्य कानूनी अधिकार के संबंध में भी है। इस तरह उच्चतम न्यायालय के रिट संबंधी न्यायिक अधिकार, उच्च न्यायालय से कम विस्तृत हैं।

2. उच्चतम न्यायालय किसी एक व्यक्ति या सरकार के विरुद्ध रिट जारी कर सकता है, जबकि उच्च न्यायालय सिर्फ संबंधित राज्य के व्यक्ति या अपने क्षेत्र के राज्य को या यदि मामला दूसरे राज्य से संबंधित हो तो वहां के खिलाफ ही जारी कर सकता है। इस तरह रिट जारी करने के संबंध में उच्चतम न्यायालय का क्षेत्रीय न्यायक्षेत्र, ज्यादा विस्तृत है।

3. अनुच्छेद 32 के अंतर्गत, उपचार अपने आप में मूल अधिकार हैं। इसलिए उच्चतम न्यायालय अपने रिट न्यायक्षेत्र को नकार नहीं सकता। दूसरी ओर, अनुच्छेद 226 के तहत उपचार विवेकानुसार है इसलिए उच्च न्यायालय अपने रिट संबंधी न्याय क्षेत्र के क्रियान्वयन को नकार सकता है। अनुच्छेद 32 उच्चतम न्यायालय को मूल अधिकारों के संबंध में उच्च न्यायालय को प्राप्त अनुच्छेद 226 के तहत शक्ति प्रदान नहीं करता है। इस तरह उच्चतम न्यायालय को मूल अधिकारों का रक्षक एवं गारंटी देने वाला बनाया गया है।

अब हम अनुच्छेद 32 एवं 226 में उल्लिखित विभिन्न प्रकार के रिटों के अभिप्राय एवं क्षेत्र को समझेंगे:

बंदी प्रत्यक्षीकरण

इसे लैटिन भाषा से लिया गया है, जिसका शाब्दिक अर्थ होता है ‘को प्रस्तुत किया जाए’। यह उस व्यक्ति के संबंध में न्यायालय द्वारा जारी आदेश है, जिसे दूसरे द्वारा हिरासत में रखा गया है, उसे इसके सामने प्रस्तुत किया जाए। तब न्यायालय मामले की जांच करता है, यदि हिरासत में लिए गए व्यक्ति का मामला अवैध है तो उसे स्वतंत्र किया जा सकता है। इस तरह यह किसी व्यक्ति को जबरन हिरासत में रखने के विरुद्ध है।

बंदी प्रत्यक्षीकरण की रिटसार्वजनिक प्राधिकरण होया व्यक्तिगत दोनों के खिलाफ जारी किया जा सकता है । यह रिट तब जारी नहीं किया की जा सकती है। यह रिट तब जारी नहीं किया जा सकता है जब यदि (i) हिरासत कानून सम्मत है, (i) कार्यवाही किसी विधानमंडल या न्यायालय की अवमानना के तहत हुई हो, (iii) न्यायालय के द्वारा हिरासत एवं (iv) हिरासत न्यायालय के न्यायक्षेत्र से बाहर हुई हो।


इसका शाब्दिक अर्थ है ‘हम आदेश देते हैं । यह एक नियंत्रण है, जिसे न्यायालय द्वारा सार्वजनिक अधिकारियों को जारी किया जाता है ताकि उनसे उनके कार्यों और उसे नकारने के संबंध में पूछा जा सके। इसे किसी भी सार्वजनिक इकाई, निगम, अधीनस्थ न्यायालयों, प्राधिकरणों या सरकार के खिलाफ समान उद्देश्य के लिए जारी किया जा सकता है।

परमादेश रिट जारी नहीं किया जा सकता- निजी व्यक्तियों या इकाई के विरुद्ध, (5) ऐसे विभाग जो गैर-संवैधानिक हैं, (ii) जब कर्तव्य विवेकानुसार हो, जरूरी नहीं, (iv) संविदात्मक दायित्व को लागू करने के विरुद्ध, (v) भारत के राष्ट्रपति या राज्यों के राज्यपालों के विरुद्ध और (v) उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जो न्यायिक क्षमता में कार्यरत हैं।


इसका शाब्दिक अर्थ ‘रोकना’। इसे किसी उच्च न्यायालय द्वारा अधीनस्थ न्यायालयों को या अधिकरणों को अपने न्यायक्षेत्र से उच्च न्यायिक कार्यों को करने से रोकने के लिए जारी किया जाता है। जिस तरह परमादेश सीधे सक्रिय रहता है, प्रतिशेध सीधे सक्रिय नहीं रहता।

प्रतिषेध संबंधी रिट सिर्फ न्यायिक एवं अर्ध-न्यायिक प्राधिकरणों के विरुद्ध ही जारी किए जा सकते हैं । यह प्रशासनिक प्राधिकरणों, विधायी निकायों एवं निजी व्यक्ति या निकायों के उपलब्ध नहीं है।


इसका शाब्दिक अर्थ ‘प्रमाणित होना’ या ‘सूचना देना’ है। इसे एक उच्च न्यायालय द्वारा अधीनस्थ न्यायालयों को या अधिकरणों को या लंबित मामलों के स्थानांतरण को सीधे या पत्र जारी कर किया जाता है। इसे अतिरिक्त न्यायिक क्षेत्र या न्यायिक क्षेत्र की कमी या कानून में खराबी के आधार पर जारी किया जा सकता है। इस तरह प्रतिषेध से हटकर जो कि केवल निवारक है; उत्प्रेषण निवारक एवं सहायक दोनों तरह का है।

जैसा कि पहले उत्प्रेषण की रिट सिर्फ न्यायिक या अर्ध न्यायिक प्राधिकरणों के खिलाफ ही जारी किया जा सकता था, प्रशासनिक इकाइयों के खिलाफ नहीं। हालांकि 1991 में उच्चतम न्यायालय ने व्यवस्था दी कि उत्प्रेषण व्यक्तियों के अधिकारों को प्रभावित करने वाले प्रशासनिक प्राधिकरणों के खिलाफ भी जारी किया जा सकता है।

प्रतिषेध की तरह उत्प्रेषण भी विधिक निकायों एवं निजी व्यक्तियों या इकाइयों के विरुद्ध उपलब्ध नहीं है।

अधिकार पृच्छा

शाब्दिक संदर्भ में इसका अर्थ किसी ‘प्राधिकत या वारंट के द्वारा’ है। इसे न्यायालय द्वारा किसी व्यक्ति द्वारा सार्वजनिक कार्यालय में दायर अपने दावे की जांच के लिए जारी किया जाता है। अतः यह किसी व्यक्ति द्वारा लोक कार्यालय के अवैध अनाधिकार ग्रहण करने को रोकता है।

रिट को पूरक सार्वजनिक कार्यालयों के मामले में तब जारी किया जा सकता है जब उसका निर्माण संवैधानिक हो। इसे मंत्रित्व कार्यालय या निजी कार्यालय के लिए जारी नहीं किया जा सकता।

अन्य चार रिटों से हटकर इसे किसी भी इच्छुक व्यक्ति द्वारा जारी किया जा सकता है न कि पीड़ित व्यक्ति द्वारा।


Article 33 empowers the Parliament to restrict or abrogate the fundamental rights of the members of armed forces, para-military forces, police forces, intelligence agencies and analogous forces. The objective of this provision is to ensure the proper discharge of their duties and the maintenance of discipline among them.

The power to make laws under Article 33 is conferred only on Parliament and not on state legislatures. Any such law made by Parliament cannot be challenged in any court on the ground of contravention of any of the fundamental rights.

Accordingly, the Parliament has enacted the Army Act (1950), the Navy Act (1950), the Air Force Act (1950), the Police Forces (Restriction of Rights) Act, 1966, the Border Security Force Act and so on. These impose restrictions on their freedom of speech, right to form associations, right to be members of trade unions or political associations, right to communicate with the press, right to attend public meetings or demonstrations, etc.

The expression‘members of the armed forces’ also covers such employees of the armed forces as barbers, carpenters, mechanics, cooks, chowkidars, bootmakers, tailors who are non-combatants.

A parliamentary law enacted under Article 33 can also exclude the court martial (tribunals established under the military law) from the writ jurisdiction of the Supreme Court and the high courts, so far as the enforcement of Fundamental Rights is concerned.

सशस्त्र बल एवं मूल अधिकार

अनुच्छेद 33 संसद को यह अधिकार देता है कि वह सशस्त्र बलों, अर्धसैनिक बलों, पुलिस बलों, खुफिया एजेंसियों एवं अन्य के मूल अधिकारों पर युक्तियुक्त प्रतिबंध लगा सके। इस व्यवस्था का उद्देश्य, उनके समुचित कार्य करने एवं उनके बीच अनुशासन बनाए रखना है।

अनुच्छेद 33 के अंतर्गत विधि निर्माण का अधिकार सिर्फ संसद को है न कि राज्य विधान मंडल को। इस तरह के संसद द्वारा बनाए गए कानून को किसी न्यायालय में किसी मूल अधिकार के उल्लंघन के संबंध में चुनौती नहीं दी जा सकती है।

इसी तरह संसद ने सैन्य अधिनियम (1950), नौ सेना अधिनियम (1950), वायु सेना अधिनियम (1950), पुलिस बल (अधिकारों पर निषेध) अधिनियम 1966, सीमा सुरक्षा बल अधिनियम आदि प्रभावी बनाए। ये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, संगठन बनाने के अधिकार, श्रमिक संघों या राजनीतिक संगठनों का सदस्य बनने का अधिकार, प्रेस से मुखातिब होने का अधिकार, सार्वजनिक बैठकों या प्रदर्शन का अधिकार आदि पर रोक लगाते हैं।

‘सैन्य बलों के सदस्य’ अभिव्यक्ति का अभिप्राय इसमें वो कर्मचारी भी शामिल हैं, जो सेना में नाई, बढ़ई, मैकेनिक, बावर्ची, चौकीदार, बूट बनाने वाला, दर्जी आदि का कार्य करते हैं।

अनुच्छेद 32 के अंतर्गत निर्मित संसदीय विधि, जहां तक मूल अधिकारों को लागू करने का संबंध है, कोर्ट मार्शल । (सैन्य विधि के अंतर्गत स्थापित अधिकरण) को उच्चतम न्यायालय और उच न्यायालयों के रिट क्षेत्राधिकार से अपवर्जित करती है।


Article 34 provides for the restrictions on fundamental rights while martial law is in force in any area within the territory of India. It empowers the Parliament to indemnify any government servant or any other person for any act done by him in connection with the maintenance or restoration of order in any area where martial law was in force. The Parliament can also validate any sentence passed, punishment inflicted, forfeiture ordered or other act done under martial law in such area.

The Act of Indemnity made by the Parliament cannot be challenged in any court on the ground of contravention of any of the fundamental rights.

The concept of martial law has been borrowed in India from the English common law. However, the expression ‘martial law’ has not been defined anywhere in the Constitution. Literally, it means ‘military rule’. It refers to a situation where civil administration is run by the military authorities according to their own rules and regulations framed outside the ordinary law. It thus imply the suspension of ordinary law and the government by military tribunals. It is different from the military law that is applicable to the armed forces.

There is also no specific or express provision in the Constitution that authorises the executive to declare martial law. However, it is implicit in Article 34 under which martial law can be declared in any area within the territory of India. The martial law is imposed under the extraordinary circumstances like war, invasion, insurrection, rebellion, riot or any violent resistance to law. Its justification is to repel force by force for maintaining or restoring order in the society.

During the operation of martial law, the military authorities are vested with abnormal powers to take all necessary steps. They impose restrictions and regulations on the rights of the civilians, can punish the civilians and even condemn them to death.

The Supreme Court held that the declaration of martial law does not ipso facto result in the suspension of the writ of habeas corpus.

The declaration of a martial law under Article 34 is different from the declaration of a national emergency under Article 352. The differences between the two are summarised as :

मार्शल लॉ एवं मूल अधिकार

अनुच्छेद 34 मूल अधिकारों पर तब प्रतिबंध लगाता है जब भारत में कहीं भी मार्शल लॉ लागू हो। यह संसद को इस बात की शक्ति देता है कि किसी भी सरकारी कर्मचारी को या अन्य व्यक्ति को उसके द्वारा किए जाने वाले कार्य की व्यवस्था को बरकरार रखे या पुनर्निर्मित करे संसद किसी मार्शल लॉ वाले क्षेत्र में जारी दंड या अन्य आदेश को वैधता प्रदान कर सकता है।

संसद द्वारा बनाए गए क्षतिपूर्ति अधिनियम को किसी न्यायालय में केवल इस आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती कि वह किसी मूल अधिकार का उल्लंघन है।

मार्शल लॉ के सिद्धांत को अंग्रेजी कानून से लिया गया। हालांकि ‘मार्शल लॉ’ की संविधान में व्याख्या नहीं की गई पर इसका शाब्दिक अर्थ है-सैन्य शासन। यह ऐसी स्थिति का परिचायक है, जहां सेना द्वारा सामान्य प्रशासन को अपने नियम कानूनों के तहत संचालित किया जाता है। इस तरह वहां साधारण कानून निलंबित हो जाता है और सरकारी कार्यों को सैन्य अधिकरणों के अधीन किया जाता है।

यह सैन्य कानून से अलग है, जो कि सशस्त्र बलों पर लाग होता है। मार्शल लॉ घोषित होने पर संविधान में कोई विशेष प्राधिकरण की व्यवस्था नहीं है, हालांकि इसे अनुच्छेद 34 के तहत भारत में कहीं भी लागू किया जा सकता है। मार्शल लॉ को असाधारण परिस्थितियां, जैसे-युद्ध, अशांति, दंगे या कानून का उल्लंघन आदि में लागू किया जाता है। इसका न्यायोचित उद्देश्य यही है कि समाज में व्यवस्था बनाई रखी जा सके।

मार्शल लॉ के क्रियान्वयन के समय सैन्य प्रशासन के पास जरूरी कदम उठाने के लिए असाधारण अधिकार मिल जाते हैं वे अधिकारों पर प्रतिबंध यहां तक कि किसी मामले में नागरिकों को मृत्युदंड तक लागू कर सकता है।

उच्चतम न्यायालय ने घोषणा की कि मार्शल लॉ प्रतिक्रियावादी परिणाम के तहत बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट को निलंबित नहीं कर सकता।

अनुच्छेद 34 के तहत मार्शल लॉ की घोषणा अनुच्छेद 352 के अंतर्गत राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा से भिन्न है। दोनों के बीच विभेद या अंतर 


Article 35 lays down that the power to make laws, to give effect to certain specified fundamental rights shall vest only in the Parliament and not in the state legislatures. This provision ensures that there is uniformity throughout India with regard to the nature of those fundamental rights and punishment for their infringement. In this direction, Article 35 contains the following provisions:

  1. The Parliament shall have (and the legislature of a state shall not have) power to make laws with respect to the following matters:
    1. Prescribing residence as a condition for certain employments or appointments in a state or union territory or local authority or other authority (Article 16).
    2. Empowering courts other than the Supreme Court and the high courts to issue directions, orders and writs of all kinds for the enforcement of fundamental rights (Article 32).
    3. Restricting or abrogating the application of Fundamental Rights to members of armed forces, police forces, etc. (Article 33).
    4. Indemnifying any government servant or any other person for any act done during the operation of martial law in any area (Article 34).
  1. Parliament shall have (and the legislature of a state shall not have) powers to make laws for prescribing punishment for those acts that are declared to be offences under the fundamental rights. These include the following:
    1. Untouchability (Article 17).
    2. Traffic in human beings and forced labour (Article 23).

Further, the Parliament shall, after the commencement of the Constitution, make laws for prescribing punishment for the above acts, thus making it obligatory on the part of the Parliament to enact such laws.

  1. Any law in force at the commencement of the Constitution with respect to any of the matters specified above is to continue in force until altered or repealed or amended by the Parliament.

It should be noted that Article 35 extends the competence of the Parliament to make a law on the matters specified above, even though some of those matters may fall within the sphere of the state legislatures (i.e., State List).

कुछ मूल अधिकारों का प्रभाव

अनुच्छेद 35 केवल संसद को कुछ विशेष मल अधिकारों को प्रभावी बनाने के लिए कानून बनाने की शक्ति प्रदान करता है। यह अधिकार राज्य विधानमंडल को नहीं प्राप्त है। यह व्यवस्था सुनिश्चित करती है कि भारत में मूल अधिकारों एवं दंड व उनके प्रकार में एकता है। इस दिशा में अनुच्छेद 35 निम्नलिखित व्यवस्था करता है:

1. संसद के पास (विधानमंडल के पास नहीं) निम्नलिखित मामलों में कानून बनाने का अधिकार होगा:

(अ) किसी राज्य या केंद्र शासित या स्थानीय या अन्य प्राधिकरण में किसी रोजगार या नियुक्ति हेतु निवास की व्यवस्था (अनुच्छेद 16)।

(ब) मूल अधिकारों के क्रियान्वयन के लिए निर्देश, आदेश, रिट जारी करने के लिए उच्चतम एवं उच्च न्यायालयों को छोड़कर अन्य न्यायालयों की सशक्त बनाना (अनुच्छेद 32)।

(स) सशस्त्र बलों, पुलिस बलों आदि के सदस्यों के मूल अधिकारों पर प्रतिबंध (अनुच्छेद 33)।

(द) किसी सरकारी कर्मचारी या अन्य व्यक्ति को किसी क्षेत्र में मार्शल लॉ के दौरान किसी कृत्य हेतु क्षतिपूर्ति देना (अनुच्छेद 34)।

2. संसद के पास (राज्य विधानमंडलों के पास नहीं) मूल अधिकारों के तहत दंडित करने के लिए कानून बनाने का अधिकार होगा। इसमें निम्नलिखित शामिल हैं:

(अ) अस्पृश्यता (अनुच्छेद 17) एवं

(ब) मानव के दुर्व्यापार और बलात् श्रम का प्रतिषेध (अनुच्छेद 23)।

इसके अतिरिक्त संसद संविधान के लागू होने के बाद उपरोक्त कार्यों के तहत दंड के लिए कानून बनाती है। इस तरह इसे संसद के लिए अनिवार्य किया जाता है कि वह ऐसे कानून बनाए।

3. उपरोक्त वर्णित मामलों के संदर्भ में संविधान के अस्तित्व में आने के समय प्रभावी कोई विधि तब तक प्रभावी रहेगी जब तक संसद द्वारा इसे परिवर्तित या निरसित संशोधित नहीं किया जाता।

यह उल्लेखनीय होना चाहिए कि अनुच्छेद 35 संसद के उपरोक्त विषयों पर कानून बनाने का प्रावधान सुनिश्चित करता है। यद्यपि इनमें से कुछ अधिकार राज्य विधानमंडल के पास भी होते हैं (यानि राज्य सूची)।


Originally, the right to property was one of the seven fundamental rights under Part III of the Constitution. It was dealt by Article 19(1) (f) and Article 31. Article 19(1)(f) guaranteed to every citizen the right to acquire, hold and dispose of property. Article 31, on the other hand, guaranteed to every person, whether citizen or non-citizen, right against deprivation of his property. It provided that no person shall be deprived of his property except by authority of law. It empowered the State to acquire or requisition the property of a person on two conditions: (a) it should be for public purpose, and ( b) it should provide for payment of compensation (amount) to the owner.

Since the commencement of the Constitution, the Fundamental Right to Property has been the most controversial. It has caused confrontations between the Supreme Court and the Parliament. It has led to a number of Constitutional amendments, that is, 1st, 4th, 7th, 25th, 39th, 40th and 42nd Amendments. Through these amendments, Articles 31A, 31B and 31C have been added and modified from time to time to nullify the effect of Supreme Court judgements and to protect certain laws from being challenged on the grounds of contravention of Fundamental Rights. Most of the litigation centred around the obligation of the state to pay compensation for acquisition or requisition of private property.

Therefore, the 44th Amendment Act of 1978 abolished the right to property as a Fundamental Right by repealing Article 19(1) (f) and Article 31 from Part III. Instead, the Act inserted a new Article 300A in Part XII under the heading ‘Right to Property’. It provides that no person shall be deprived of his property except by authority of law. Thus, the right to property still remains a legal right or a constitutional right, though no longer a fundamental right. It is not a part of the basic structure of the Constitution.

The right to property as a legal right (as distinct from the Fundamental Rights) has the following implications:

  1. It can be regulated ie, curtailed, abridged or modified without constitutional amend-ment by an ordinary law of the Parliament.
  2. It protects private property against executive action but not against legislative action.
  3. In case of violation, the aggrieved person cannot directly move the Supreme Court under Article 32 (right to constitutional remedies including writs) for its enforcement. He can move the High Court under Article 226.
  4. No guaranteed right to compensation in case of acquisition or requisition of the private property by the state.

Though the Fundamental Right to Property under Part III has been abolished, the Part III still carries two provisions which provide for the guaranteed right to compensation in case of acquisition or requisition of the private property by the state. These two cases where compensation has to be paid are:

  1. When the State acquires the property of a minority educational institution (Article 30); and
  2. When the State acquires the land held by a person under his personal cultivation and the land is within the statutory ceiling limits (Article 31 A).

The first provision was added by the 44th Amendment Act (1978), while the second provision was added by the 17th Amendment Act (1964).

Further, Articles 31A, 31B and 31C have been retained as exceptions to the fundamental rights.

संपत्ति के अधिकार की वर्तमान स्थिति

वास्तव में संविधान के भाग 3 में उल्लिखित 7 मल अधिकारों में से संपत्ति का अधिकार एक था। अनुच्छेद 19 (1) (च) एवं अनुच्छेद 31 में वर्णित था। अनुच्छेद 19(1)(च) प्रत्येक नागरिक

को संपत्ति को अधिग्रहण करने उसको रखने एवं निपटाने की गारंटी देता था, जबकि दूसरी तरफ अनुच्छेद 31 प्रत्येक व्यक्ति को चाहे वह नागरिक हो या गैर-नागरिक को अपनी संपत्ति वंचन करने के खिलाफ अधिकार प्रदान करता है। इसमें यह व्यवस्था है कि बिना विधि सम्मत कानून के कोई भी संपत्ति पर अधिकार नहीं जताएगा। यह राज्य को किसी व्यक्ति की संपत्ति अधिग्रहण कर दो शर्तों के अधार पर शक्ति प्रदान करता है-(अ) इसे सार्वजनिक उद्देश्य के लिए किया जाना चाहिए, और; (ब) इसका हरजाना (क्षतिपूर्ति) उसके मालिक को दिया जाना चाहिए।

संविधान लागू होने के समय से ही संपत्ति का मूल अधिकार सबसे अधिक विवादास्पद रहा। इसके कारण संसद व उच्चतम न्यायालय के बीच विवाद उत्पन्न हुआ। इस पर कई सारे संविधान संशोधन हुए। उनमें पहला, चौथा, सातवां, पच्चीसवां, उनतालिसा, चालीसा एवं बयालिसवां संशोधन शामिल हैं। इन संशोधन के द्वारा अनुच्छेद 31क, 31ख और 31ग को जोड़ा गया और समयसमय पर उच्चतम न्यायालय के फैसले को इस विवादास्पद अधिकार के संबंध में कम किया गया। इनमें से अधिकतर मामले निजी संपत्ति के लिए अनुरोध, उनके अधिग्रहण एवं उनके क्षतिपूर्ति के भुगतान के संबंध में थे।

इस प्रकार 44वें संशोधन अधिनियम 1978 द्वारा मूल अधिकारों में से संपत्ति के अधिकार को भाग 3 में अनुच्छेद 19(1)(च) और अनुच्छेद 31 को निरसित किया गया। संपत्ति का अधिकार’ शीर्षक के तहत भाग 12 में नए अनुच्छेद 300A को शुरू किया गया। इसमें व्यवस्था दी गई कि कोई भी व्यक्ति कानून के बिना संपत्ति से वंचित नहीं किया जाएगा। इस तरह संपत्ति का अधिकार अब भी एक कानूनी या संवैधानिक अधिकार है। यद्यपि यह कोई मूल अधिकार नहीं है। यह संविधान के मूल ढांचे का भी हिस्सा नहीं है।

संपत्ति का अधिकार एक विधिक अधिकार की तरह (जैसा कि मूल अधिकारों से अलग) निम्नलिखित तरीकों से लागू होता

(अ) इसे बिना संविधान संशोधन के संसद के साधारण कानून के तहत नियमित, कम या पुनर्निर्धारित किया जा सकता है।

(ब) यह कार्यकारी क्रिया के खिलाफ निजी संपत्ति की रक्षा करता है लेकिन विधायी कार्य के खिलाफ नहीं।

(स) उल्लंघन के मामले में पीड़ित व्यक्ति अनुच्छेद 32 (संवैधानिक उपचार के अधिकार जिसमें रिट शामिल है) के तहत सीधे उच्चतम न्यायालय नहीं जा सकता। वह अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय जा सकता है।

(द) राज्य द्वारा निजी संपत्ति के अधिग्रहण या अनुरोध के मामले में हरजाने के अधिकार की कोई गारंटी नहीं।

इस तरह संपत्ति के मूल अधिकार को भाग 3 से समाप्त कर दिया गया है। भाग 3 में अब भी यह व्यवस्था है कि राज्य द्वारा निजी संपत्ति के अधिग्रहण पर हरजाने का अधिकार होगा। इन दो मामलों में भुगतान होगाः

(अ) जब राज्य द्वारा किसी अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान (अनुच्छेद 30) की संपत्ति का अधिग्रहण किया जाए और

(ब) जब राज्य उस संपत्ति का अधिग्रहण करे, जिस पर व्यक्ति अपनी फसल उगा रहा है और भूमि सांविधिक निर्धारित सीमा के अंदर (अनुच्छेद 31क)।

पहली व्यवस्था को 44वें संशोधन अधिनियम (1978) के तहत जोड़ा गया, जबकि दूसरी व्यवस्था को 17वें संशोधन अधिनियम (1964) के तहत। इस तरह अनुच्छेद 31क, 31ख, और 31ग को मूल अधिकारों के प्रतिवाद के रूप में स्थापित किया गया।


1. Saving of Laws Providing for Acquisition of Estates, etc.

Article 31A saves five categories of laws from being challenged and invalidated on the ground of contravention of the fundamental rights conferred by Article 14 (equality before law and equal protection of laws) and Article 19 (protection of six rights in respect of speech, assembly, movement, etc.). They are related to agricultural land reforms, industry and commerce and include the following:

    1. Acquisition of estates and related rights by the State;
    2. Taking over the management of properties by the State;
    3. Amalgamation of corporations;
    4. Extinguishment or modification of rights of directors or shareholders of corporations; and
    5. Extinguishment or modification of mining leases.

Article 31A does not immunise a state law from judicial review unless it has been reserved for the president’s consideration and has received his assent.

This Article also provides for the payment of compensation at market value when the state acquires the land held by a person under his personal cultivation and the land is within the statutory ceiling limit.

  1. संपदाओं आदि के अर्जन के लिए उपबंध करने वाली विधियों की व्यावृत्ति

अनुच्छेद 31क विधियों की पांच श्रेणियों से व्यावृत्ति प्रदान करता है कि इन्हें अनुच्छेद 14 (विधि के समक्ष समता और विधियों की समान संरक्षण) और अनुच्छेद 19 (वाक्-स्वातंत्र्य, सम्मेलन, संचरण इत्यादि के संबंध में मूल अधिकारों की सुरक्षा) द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों के उल्लंघन के आधार पर चुनौती और अवैध नहीं ठहराया जा सकता।

(अ) राज्य द्वारा संपदाओं का अधिग्रहण और संबंधित अधिकार।

(ब) राज्य द्वारा संपत्ति के प्रबंधन का दायित्व संभालना।

(स) निगमों का सम्मिश्रण।

(द) निगमों के शेयरधारकों या निदेशकों के अधिकारों का पुनर्निर्धारण या समाप्ति।

(इ) खनन पट्टे का पुनर्निर्धारण या उनकी समाप्ति।

अनुच्छेद 31क राज्य को न्यायिक समीक्षा से उन्मुक्ति प्रदान नहीं करता है, जब इसे राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित रखा गया हो और इसे सहमति प्राप्त हो गई हो।

यह अनुच्छेद इस बात की भी व्यवस्था करता है कि राज्य अधिगृहीत ऐसी भूमि का जिसका उपयोग कोई व्यक्ति सांविधिक निर्धारित सीमा के अंदर और फसल उत्पादन के लिये कर रहा होगा भूमि का बाजार मूल्य के अनुसार क्षतिपूर्ति देगा।

2. Validation of Certain Acts and Regulations

Article 31B saves the acts and regulations included in the Ninth Schedule18 from being challenged and invalidated on the ground of contravention of any of the fundamental rights. Thus, the scope of Article 31B is wider than Article 31A. Article 31B immunises any law included in the Ninth Schedule from all the fundamental rights whether or not the law falls under any of the five categories specified in Article 31A.

However, in a significant judgement delivered in I.R. Coelho case18a (2007), the Supreme Court ruled that there could not be any blanket immunity from judicial review of laws included in the Ninth Schedule. The court held that judicial review is a ‘basic feature’ of the constitution and it could not be taken away by putting a law under the Ninth Schedule. It said that the laws placed under the Ninth Schedule after April 24, 1973, are open to challenge in court if they violated fundamentals rights guaranteed under Articles 14, 15, 19 and 21 or the ‘basic structure’ of the constitution. It was on April 24, 1973, that the Supreme Court first propounded the doctrine of ‘basic structure’ or ‘basic features’ of the constitution in its landmark verdict in the Kesavananda Bharati Case.

Originally (in 1951), the Ninth Schedule contained only 13 acts and regulations but at present (in 2016) their number is 282.20 Of these, the acts and regulations of the state legislature deal with land reforms and abolition of the zamindari system and that of the Parliament deal with other matters.

  1. कुछ अधिनियमों और विनियमोंकाविधिमान्यकरण

अनुच्छेद 31ख नौवीं अनुसूची में उल्लिखित अधिनियमों एवं नियमों को व्यावृत्ति प्रदान करता है, इस तरह अनुच्छेद 31 ख का क्षेत्र 31क से ज्यादा विस्तृत है। अनुच्छेद 31ख नौवीं अनुसूची में सम्मिलित किसी भी विधि को सभी मूल अधिकारों से उन्मुक्ति प्रदान करता है फिर चाहे विधि अनुच्छेद 31क में उल्लिखित पांच श्रेणियों में से किसी के अंतर्गत हो या नहीं। ।

यद्यपि आई.आर. कोएल्हो केस में उच्चतम न्यायालय ने अपने एक निर्णय में कहा कि नौवीं अनुसूची में सम्मिलित विधियों को न्यायिक समीक्षा से उन्मुक्ति प्राप्त नहीं हो सकती। न्यायालय ने कहा कि न्यायिक समीक्षा संविधान की मूल विशेषता है और किसी विधि को नौवीं अनुसूची के अंतर्गत रखे, इसकी यह विशेषता समाप्त नहीं की जा सकती। इसने निर्णय दिया कि 24 अप्रैल, 1973 के बाद नौवीं अनुसूची में सम्मिलित विधियों को न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है, यदि वे संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19 और 21 या इसके मूल रूप का उल्लंघन मूल रूप या मूल विशेषताओं सिद्धांत को प्रतिपादित किया। 24 अप्रैल, 1973 को उच्चतम न्यायालय ने पहली बार केशवानंद भारती मामले में अपने ऐतिहासिक फैसले में संविधान के मौलिक ढांचे के सिद्धांत को प्रतिपादित किया।

मूलतः (1951 में) नौवीं सूची में सिर्फ 13 अधिनियमों एवं विनियमों को रखा गया था। लेकिन इस समय (वर्ष 2016 तक) इनकी संख्या 282° हो गई है। इनमें, राज्य विधानमंडल के अधिनियम एवं विनियम है, जो भू-सुधार से संबंधित हैं तथा जमीदारी व्यवस्था को समाप्त करना और संसद के कार्य क्षेत्र के अन्य मामले शामिल हैं।

3. Saving of Laws Giving Effect to Certain Directive Principles

Article 31C, as inserted by the 25th Amendment Act of 1971, contained the following two provisions:

  1. No law that seeks to implement the socialistic directive principles specified in Article 39(b) or (c) shall be void on the ground of contravention of the fundamental rights conferred by Article 14 (equality before law and equal protection of laws) or Article 19 (protection of six rights in respect of speech, assembly, movement, etc.)
  2. No law containing a declaration that it is for giving effect to such policy shall be questioned in any court on the ground that it does not give effect to such a policy.

In the Kesavananda Bharati case (1973), the Supreme Court declared the above second provision of Article 31C as unconstitutional and invalid on the ground that judicial review is a basic feature of the Constitution and hence, cannot be taken away. However, the above first provision of Article 31C was held to be constitutional and valid.

The 42nd Amendment Act (1976) extended the scope of the above first provision of Article 31C by including within its protection any law to implement any of the directive principles specified in Part IV of the Constitution and not merely in Article 39 (b) or (c). However, this extention was declared as unconstitutional and invalid by the Supreme Court in the Minerva Mills case(1980).

  1. कुछ निदेशक तत्वों को प्रभावी करने वाली विधियों की व्यावृत्ति

25वें संशोधन अधिनियम 1971 द्वारा यथा समाहित अनुच्छेद 31ग में निम्नांकित दो उपबंध हैं:

(क) कोई भी कानून जिसमें अनुच्छेद 39(ख)” अथवा (ग) में विनिर्दिष्ट सामाजवादी निर्देशक सिद्धांतों को लागू करने की मांग की गयी है, अनुच्छेद 14 (विधि के समक्ष समानता और समान कानूनी संरक्षण) अथवा अनुच्छेद 19 (अभिव्यक्ति, सभा करने, देश भर में घूमने आदि के संबंध में छह अधिकारों की रक्षा) द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों के उल्लान के आधार पर अमान्य घोषित नहीं होगा।

(ख) कोई भी विधि जो यह घोषणा करे कि यह ऐसी नीति को प्रभावी करने हेतु है उसे किसी भी न्यायालय में इस आधार पर चुनौती दी जा सकती है कि यह ऐसी नीति को प्रभावी नहीं करता है।

केशवानंद भारती मामले (1973) में उच्चतम न्यायालय ने उपरोक्त अनुच्छेद 31ग के द्वितीय प्रावधान को संविधान की महत्वपूर्ण विशेषता न्यायिक समीक्षा के आधार पर गैर-संवैधानिक बताया गया। हालांकि अनुच्छेद 31ग के पहले प्रावधान को संवैधानिक एवं वैध माना है।

42वें संशोधन अधिनियम (1976) ने अनुच्छेद 31ग के उपरोक्त पहले प्रावधान के क्षेत्र में न केवल अनुच्छेद 39(ख) या (ग) में बल्कि संविधान के भाग-4 में वर्णित किसी निदेशक तत्व को लागू करने के लिए किसी विधि की अपनी संरक्षा में सम्मिलित कर विस्तृत किया। हालांकि इस विस्तार को उच्चतम न्यायालय द्वारा मिनर्वा मिल्स मामले (1980) में असंवैधानिक एवं अवैध घोषित किया गया।


The Fundamental Rights enshrined in Part III of the Constitution have met with a wide and varied criticism. The arguments of the critics are:

1. Excessive Limitations

They are subjected to innumerable exceptions, restrictions, qualifications and explanations. Hence, the critics remarked that the Constitution grants Fundamental Rights with one hand and takes them away with the other. Jaspat Roy Kapoor went to the extent of saying that the chapter dealing with the fundamental rights should be renamed as ‘Limitaions on Fundamental Rights’ or ‘Fundamental Rights and Limitations Thereon’.

2. No Social and Economic Rights

The list is not comprehensive as it mainly consists of political rights. It makes no provision for important social and economic rights like right to social security, right to work, right to employment, right to rest and leisure and so on. These rights are made available to the citizens of advanced democratic countries. Also, the socialistic constitutions of erstwhile USSR or China provided for such rights.

3. No Clarity

They are stated in a vague, indefinite and ambiguous manner. The various phrases and words used in the chapter like ‘public order’, ‘minorities’, ‘reasonable restriction’, ‘public interest’ and so on are not clearly defined. The language used to describe them is very complicated and beyond the comprehension of the common man. It is alleged that the Constitution was made by the lawyers for the lawyers. Sir Ivor Jennings called the Constitution of India a ‘paradise for lawyers’.

4. No Permanency

They are not sacrosanct or immutable as the Parliament can curtail or abolish them, as for example, the abolition of the fundamental right to property in 1978. Hence, they can become a play tool in the hands of politicians having majority support in the Parliament. The judicially innovated ‘doctrine of basic structure’ is the only limitation on the authority of Parliament to curtail or abolish the fundamental right.

5. Suspension During Emergency

The suspension of their enforcement during the operation of National Emergency (except Articles 20 and 21) is another blot on the efficacy of these rights. This provision cuts at the roots of democratic system in the country by placing the rights of the millions of innocent people in continuous jeopardy. According to the critics, the Fundamental Rights should be enjoyable in all situations–Emergency or no Emergency.

6. Expensive Remedy

The judiciary has been made responsible for defending and protecting these rights against the interference of the legislatures and executives. However, the judicial process is too expensive and hinders the common man from getting his rights enforced through the courts. Hence, the critics say that the rights benefit mainly the rich section of the Indian Society.

7. Preventive Detention

The critics assert that the provision for preventive detention (Article 22) takes away the spirit and substance of the chapter on fundamental rights. It confers arbitrary powers on the State and negates individual liberty. It justifies the criticism that the Constitution of India deals more with the rights of the State against the individual than with the rights of the individual against the State. Notably, no democratic country in the world has made preventive detention as an integral part of their Constitutions as has been made in India.

8. No Consistent Philosophy

According to some critics, the chapter on fundamental rights is not the product of any philosophical principle. Sir Ivor Jennings expressed this view when he said that the Fundamental Rights proclaimed by the Indian Constitution are based on no consistent phi-losophy. The critics say that this creates difficulty for the Supreme Court and the high courts in interpreting the fundamental rights.

संविधान के भाग III में वर्णित मूल अधिकारों की व्यापक एवं मिश्रित आलोचनाएं भी हुईं हैं। आलोचकों के तर्क इस प्रकार हैं:

1. व्यापक सीमाएं

ये असंख्य अपवादों, प्रतिबंधों, गुणों एव व्याख्याओं के विषय हैं।

इस तरह आलोचकों ने इस बात का उल्लेख किया है कि एक

तरफ तो संविधान मूल अधिकार प्रदान करता है और दूसरी तरफ उन्हें छीन लेता है, जसपत राय कपूर इस संबंध में कहते हैं कि मूल अधिकारों के भाग को इस तरह कहा जाना चाहिए’मूल अधिकारों की सीमाएं’ या मूल अधिकार एवं उसमें निहित सीमाएं’।

2. कोई सामाजिक एवं आर्थिक अधिकार नहीं

यह सूची व्यापक नहीं है। इसमें मुख्यतः राजनीतिक अधिकारों का उल्लेख है। इसमें महत्वपूर्ण सामाजिक एवं आर्थिक अधिकारों की व्यवस्था नहीं है, जैसे-सामाजिक सुरक्षा का अधिकार, काम का अधिकार, रोजगार का अधिकार, विश्राम एवं सुविधा का अधिकार आदि। ये अधिकार उन्नत लोकतांत्रिक देशों के नागरिकों को प्राप्त हैं। समाजवादी संविधानों, जैसे-रूस एवं चीन में भी ऐसे अधिकारों की व्यवस्था है।

3. स्पष्टता का अभाव

इनकी व्याख्या अस्पष्ट, अनिश्चित एवं धुंधली है। कई अभिव्यक्तियां एवं शब्द, जैसे- लोक व्यवस्था’, ‘अल्पसंख्यक’, ‘उचित प्रतिबंध’, ‘सार्वजनिक हित’ आदि सही व्याख्यायित नहीं हैं । इसको समझाने

के लिए जिस भाषा का प्रयोग किया गया है, वह एक आम आदमी – के समझने के लिए काफी जटिल है। ऐसा आरोप भी लगाया जाता है कि संविधान को वकीलों द्वारा वकीलों के लिए बनाया गया है। सर आइवर जेनिंग्स ने भारतीय संविधान को ‘वकीलों के लिए स्वर्ग’ की संज्ञा दी है।

4. स्थायित्व का अभाव

ये अलंघनीय और अपरिवर्तनीय नहीं हैं। जैसे कि संसद इनमें कटौती कर सकती है या समाप्त कर सकती है। उदाहरण के लिए संपत्ति के मूल अधिकार को 1978 में समाप्त कर दिया गया। ये संसद में बहुमत वाले राजनीतिज्ञों का एक हथियार हैं । न्याय क्षेत्र द्वारा बनाया गया ‘मूल ढांचे का सिद्धांत’, जिसमें मूल अधिकारों में कटौती या उनको समाप्त करने के संसद में अधिकार की सीमाएं निहित हैं।

5. आपातकाल के दौरान स्थगन

राष्ट्रीय आपातकाल के समय इनके क्रियान्वयन का स्थगन (केवल अनुच्छेद 20 और 21 के) इन अधिकारों पर एक और प्रतिबंध है। यह व्यवस्था लोकतांत्रिक व्यवस्था की जड़ों को दुर्बल करती है तथा करोड़ों निर्दोष लोगों के अधिकारों को समाप्त करती है। आलोचकों के अनुसार, मूल अधिकारों को हमेशा रहना चाहिए चाहे-आपातकाल हो या सामान्य स्थिति।

6. महंगा उपचार

न्यायपालिका को इन अधिकारों की रक्षा एवं विधानमंडल व कार्यपालिका द्वारा इस पर हस्तक्षेप के विरुद्ध जिम्मेदार बनाया गया है लेकिन न्यायिक प्रक्रिया आम आदमी के लिए काफी खर्चीली 1 है। इसलिए आलोचक कहते हैं कि भारतीय समाज में अधिकार सुविधा मूलतः धनाढ्य लोगों के लिए ही है।

7. निवारक निरोध

आलोचकों का मत है कि निवारक निरोध का उपबंध (अनुच्छेद 22) मूल अधिकारों की मुख्य भावना से इसे दूर करता है। यह राज्य को मनमानी शक्ति प्रदत्त करती है और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को नकारती है। यह इस आलोचना को न्यायोचित ठहराती है कि भारत का संविधान, व्यक्तिगत अधिकारों की तुलना में राज्य के अधिकारों की ज्यादा व्यवस्था करता है। किसी भी लोकतांत्रिक देश में निवारक निरोध को भारत की तरह संविधान का आंतरिक भाग नहीं बनाया गया है।

8. प्रतिमान दर्शन नहीं

कुछ आलोचकों के अनुसार, मूल अधिकारों पर पाठ किसी दार्शनिक सिद्धांत की उपज नहीं है। सर आइवर जेनिंग्स ने कहा है कि मूल अधिकारों को किसी प्रतिमान दर्शन के आधार पर घोषित नहीं किया गया है। आलोचक कहते हैं कि ये उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों के लिए मूल अधिकारों की व्याख्या में कठिनाई उत्पन्न करते हैं।


In spite of the above criticism and shortcomings, the Fundamental Rights are significant in the following respects:

  1. They constitute the bedrock of democratic system in the country.
  2. They provide necessary conditions for the material and moral protection of man.
  3. They serve as a formidable bulwark of individual liberty.
  4. They facilitate the establishment of rule of law in the country.
  5. They protect the interests of minorities and weaker sections of society.
  6. They strengthen the secular fabric of the Indian State.
  7. They check the absoluteness of the authority of the government.
  8. They lay down the foundation stone of social equality and social justice.
  9. They ensure the dignity and respect of individuals.
  10. They facilitate the participation of people in the political and administrative process.

मूल अधिकारों का महत्व

उपरोक्त आलोचनाओं के बावजूद निम्नलिखित मामलों में मूल अधिकार महत्वपूर्ण हैं:

1. ये देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था को स्थापित करते हैं।

2. ये व्यक्ति की भौतिक एवं नैतिक सुरक्षा के लिए आवश्यक स्थिति उत्पन्न करते हैं।

3. ये व्यक्तिगत स्वतंत्रता के रक्षक हैं।

4. वे देश में विधि के शासन की स्थापना करते हैं।

5. ये अल्पसंख्यकों एवं समाज के कमजोर वर्गों के हितों की रक्षा करते हैं।

6. ये भारतीय राज्य की धर्म निरपेक्ष छवि को बल प्रदान करते हैं।

7. ये सरकार के शासन की पूर्णता पर नियंत्रण करते हैं।

8. ये सामाजिक समानता एवं सामाजिक न्याय की आधारशिला रखते हैं।

9. ये व्यक्तिगत सम्मान को बनाए रखना सुनिश्चित करते हैं।

10. ये लोगों को राजनीतिक एवं प्रशासनिक प्रणाली में भाग लेने का अवसर प्रदान करते हैं।


Besides the Fundamental Rights included in Part III, there are certain other rights contained in other parts of the Constitution. These rights are known as constitutional rights or legal rights or non-fundamental rights. They are:

  1. No tax shall be levied or collected except by authority of law (Article 265 in Part XII).
  2. No person shall be deprived of his property save by authority of law (Article 300-A in Part XII).
  3. Trade, commerce and intercourse throughout the territory of India shall be free (Article 301 in Part XIII).

Even though the above rights are also equally justiciable, they are different from the Fundamental Rights. In case of violation of a Fundamental Right, the aggrieved person can directly move the Supreme Court for its enforcement under Article 32, which is in itself a fundamental right. But, in case of violation of the above rights, the aggrieved person cannot avail this constitutional remedy. He can move the High Court by an ordinary suit or under Article 226 (writ jurisdiction of high court).

भाग 3 के बाहर अधिकार

भाग 3 में सम्मिलित मूल अधिकारों के अतिरिक्त संविधान के कुछ अन्य भागों में अन्य अधिकार वर्णित हैं। इन अधिकारों को सांविधानिक अधिकार या विधिक अधिकार या गैर-मूल अधिकार भी कहा जाता है। ये हैं:

1. विधि के प्राधिकार के बिना किसी कर को अधिरोपित या संगृहीत न किया जाना (भाग-12 में अनुच्छेद 265)।

2. विधि के प्राधिकार के बिना व्यक्तियों को संपत्ति से वंचित न किया जाना (भाग 13 में अनुच्छेद 300क)।

3. भारत के राज्यक्षेत्र में सर्वत्र व्यापार, वाणिज्य और समागम अबाध होगा (भाग 13 में अनुच्छेद 301)।

4. लोक सभा और राज्यों की विधानसभाओं के लिए निर्वाचन वयस्क मताधिकार के आधार पर होंगे (भाग 15 में अनुच्छेद 326)।

यद्यपि उपरोक्त अधिकार समान रूप से न्यायोचित हैं, पर ये यह मूल अधिकारों से भिन्न हैं। मूल अधिकार का उल्लंघन होने पर दुखी व्यक्ति अनुच्छेद 32, जोकि स्वयं में मूल अधिकार है, के अंतर्गत सीधे सर्वोच्च न्यायालय जा सकता है। परन्तु उपरोक्त अधिकारों के उल्लंघन के मामले में व्यक्ति इस सांविधानिक उपचार को प्रयुक्त नहीं कर सकता। वह सामान्य मुकदमों या अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार) के तहत केवल उच्च न्यायालय में जा सकता है।

By : Ramakant Verma

Create your website with
Get started
%d bloggers like this: