झारखण्ड में वन

झारखण्ड शब्द से झाड़-जंगल से भरे क्षेत्र का बोध होता है। यह क्षेत्र प्राचीन काल से ही जंगलों से आच्छादित रहा है। लेकिन जंगलों की अंधाधुंध कटाई और चारगाह के रूप में निरंतर इस्तेमाल से इसमें कमी आई है। अभी झारखण्ड में राज्य के कुल क्षेत्रफल के 23,605 वर्ग किमी. (29.61%) भाग में ही वन पाए जाते हैं। यह भारत के कुल वन-क्षेत्र का लगभग 3.4% है। भारत में देश के कुल क्षेत्रफल के लगभग 21% भाग में वन पाए जाते हैं। झारखण्ड में वनों का औसत राष्ट्रीय औसत से अधिक है।

  • झारखण्ड में राज्य 79,714 वर्ग किमी के भौगोलिक क्षेत्र के साथ राज्य देश के क्षेत्रफल का 2.42% है।
  • फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया द्वारा प्रकाशित India State of Forest Report, 2019 के अनुसार, राज्य का कुल दर्ज वन क्षेत्र 23,605 वर्ग किमी है जो राज्य के भौगोलिक क्षेत्र का 29.61% है।
  • कुल दर्ज वन क्षेत्र में, आरक्षित वन 18.59%( 4,387 वर्ग कि.मी.), संरक्षित वन 81.28%( 19,185 वर्ग कि.मी.) और अवर्गीकृत वन 0.14%(33 वर्ग कि.मी.) हैं
  • कुल वन और वृक्ष का आवरण सम्मलित रूप से राज्य के भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 33.21% है।

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Download : District- Forest Cover in Jharkhand as per India State of Forest Report, 2019 (IN HINDI)

राष्ट्रीय वन नीति (1988) के अनुसार, किसी प्रदेश के कुल क्षेत्रफल के कम-से-कम एक तिहाई अर्थात् 33.33% भाग पर वन का विस्तार होना चाहिए। इस दृष्टि से झारखण्ड में वन, जो कि कुल क्षेत्रफल के 30% भाग पर है, वनों की आदर्श स्थिति से कुछ कम है। झारखण्ड में मुख्यतः दो प्रकार के वन पाए जाते हैं

(i) उष्णकटिबन्धीय आर्द्र पर्णपाती/पतझड़ वन : छोटानागपुर की उच्च भूमि, राची का पठार तथा संथाल परगना में विस्तृत राजमहल की पहाड़ियों के क्षेत्र में अधिक वर्षा, ऊँचाई, गर्मी में तेज तापमान आदि आर्द्र पर्णपाती वनों के विकास के लिए सहायक हैं। मूलत: इनका विकास उन क्षेत्रों में मिलता है, जहाँ औसत वार्षिक वर्षा 120 सेमी से अधिक होती है। अतः राँची, पलामू और हजारीबाग में इस प्रकार के वनों की अधिकता है।  शुष्क ग्रीष्मकाल में पेड़ अपनी पत्तियाँ गिरा देते हैं, ताकि वाष्पोत्सर्जन को कम किया जा सके। पतझड़ का मौसम 2-3 सप्ताहों (मार्च का अन्त एवं अप्रैल का प्रारम्भ) का होता है। इन क्षेत्रों में आम,जामुन, पियार और कटहल जैसे चिरहरित वन, साल जैसे आई पर्णपाती वृक्ष पाए जाते हैं। छोटानागपुर क्षेत्र में महुआ, जामुन, कुसुम, गूलर, आसन, पियार, खैर, अमलतास, गम्हार, केन, अंजन, करंज, बरगद, पीपल और सेमल के वृक्षों की बहुतायत है।

(ii) उष्णकटिबन्धीय शुष्क पर्णपाती वन : प्जहाँ औसत वार्षिक वर्षा 120 सेमी से कम होती है, वहाँ शुष्क पतझड़ वनों का विकास हुआ है। यहाँ पतझड़ का मौसम अपेक्षाकृत लम्बा होता है। पेड़ों की ऊँचाई तथा सघनता कम पाई जाती है। साल सबसे प्रमुख वृक्ष है, परन्तु आर्द्र पतझड़ वनों की तुलना में इसकी ऊँचाई कम मिलती है। साल के साथ सर्वत्र बाँस की उपस्थिति दिखाई पड़ती है। इसके अलावा खैर, महुआ, पलास, अमलतास, आसन, आबनूस, आंवला, बबूल, हरे, बहेड़ा जैसे वृक्षों की प्रचुरता ऐसे वनों में पाई जाती है। ये वन पलामू जिले के शुष्क भागों में आसानी से देखे जा सकते हैं। शुष्क पर्णपाती वनों में लताएं और घासें भी पायी जाती हैं, जिनमें सवाइ, मूंज, दूब और मोथा आदि प्रधान हैं।

शुष्क पतझड़ वनों के दृष्टिकोण से तीन क्षेत्र महत्त्वपूर्ण हैं : (i) उत्तरी-पश्चिमी झारखण्ड (ii) झारखण्ड का उत्तरी सीमावर्ती क्षेत्र  (iii) सन्थाल परगना का पश्चिमी सीमावर्ती प्रदेश

वन उत्पाद

वनों से प्राप्त होने वाले उत्पादों को ‘वन उत्पाद’/’वनोत्पाद’ (Forest Produces) कहते हैं। वन उत्पाद दो तरह के होते हैं—मुख्य उत्पाद एवं गौण उत्पाद । मुख्य उत्पाद (Major Produces) के अंतर्गत लकड़ी सम्बन्धी वन उत्पादों को शामिल किया जाता है, जबकि गौण उत्पाद (Minor Produces) के अंतर्गत लकड़ी को छोड़ शेष वन उत्पादों को शामिल किया जाता है।

1. मुख्य उत्पाद

झारखण्ड में पाए जाने वाले मुख्य उत्पाद इस प्रकार हैं

(i) साल (Sal) : इसकी कठोरता असाधारण होती है। इसलिए इसका उपयोग इमारतों की लकड़ियों के रूप में बहुतायत में होता है। साल वृक्ष की लकड़ी मकान, फर्नीचर, रेल के डिब्बे एवं पटरियों को रखने के स्लैब आदि बनाने में और अन्य आवश्यक वस्तुओं के निर्माण में काम आती है तथा बची हुई लकड़ी जलावन के काम आती है। साल को ‘सखुआ’ भी कहते हैं। साल के पुष्पों को ‘सरई फूल’ कहते हैं। साल के बीजों से तेल निकाला जाता है, जिसे ‘कुजरी तेल’ कहते हैं, जो प्राकृतिक चिकित्सा के लिए बहत उपयोगी है। साल को झारखण्ड में ‘राजकीय वृक्ष’ का दर्जा प्राप्त है।

(ii) शीशम (Sisoo) : शीशम की लकड़ी काफी मजबूत होती है। उपयोग—फर्नीचर बनाने में।

(iii) महुआ (Mahua) : महुआ झारखण्ड का सर्वाधिक उपयोगी वृक्ष है क्योंकि इसकी लकड़ी, फूल, फल, बीज—सभी उपयोगी होते हैं। इसकी लकड़ी काफी मजबूत होती है और ये पानी पाकर भी जल्दी नहीं सड़ती, इसलिए इसकी लकड़ी से दरवाजे एवं खम्भे बनाए जाते हैं। इसके फूल से देशी शराब बनाई जाती है। इसके फलों को बतौर सब्जी खाया जाता है। इसके बीज से तेल निकाला जाता है।

(iv) सागौन (Teak) : इसकी लकड़ी बहुत ही मजबूत एवं सुन्दर होती है। उपयोग—फर्नीचर बनाने में, रेल के डिब्बे, हवाई जहाज आदि में।

(v) सेमल (Semal) : इसकी लकड़ी हल्की, मुलायम व सफेद होती है। उपयोग—पैकिंग के लिए बनाए जाने वाली पेटियों में, तख्तियाँ बनाने में, खिलौने बनाने में आदि। सेमल की रुई का व्यापक उपयोग है।

(vi) गम्हार (Gamhar) : इसकी लकड़ी हल्की, मुलायम व चिकनी होने के साथ-साथ काफी टिकाऊ होती है। लकड़ियों पर नक्काशी करने की दृष्टि से यह सबसे अधिक उपयोगी लकड़ी है। उपयोग—फर्नीचर बनाने में आदि।

(vii) आम (Mango) : इसकी लकड़ी सस्ती व सुलभ होती है। उपयोगदरवाजे, खम्भे, खिड़की एवं अन्य फर्नीचर बनाने में। इसके फल बहुत स्वादिष्ट होते हैं, जिस कारण इसे ‘फलों का राजा’ कहा जाता है। इसके फल को ‘अमृतफल’ भी कहा जाता है।

(vii) जामुन (Jambo) : इसकी लकड़ी पानी में हजारों वर्ष रहने के बावजूद नहीं सड़ती है। इसी कारण इसे कुएं के आधार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। अन्य उपयोग—फर्नीचर बनाने में। इसका फल खाया जाता है और इसके बीजों से दवा बनाई जाती है।

(ix) कटहल (Jackfruit) : इसकी लकड़ी महत्वपूर्ण इमारती लकड़ी मानी जाती है। इसका फल काफी चाव से खाया जाता है।

(x) केन्दु (Kendu) : केन्दु को मुख्य उत्पाद एवं गौण उत्पाद दोनों वर्गों में शामिल किया जाता है। जब केन्दु की लकड़ियों का उत्पाद बनाया जाता है तो वह मुख्य उत्पाद होता है, किन्तु जब केन्दु की पत्तियों का उत्पाद बनाया जाता है तो वह गौण उत्पाद होता है। ध्यातव्य है कि केन्दु का उपयोग मुख्य उत्पाद की तुलना में गौण उत्पाद के रूप में ज्यादा होता है।

(xi) अन्य (Others) : अन्य इमारती लकड़ियों में पैसार, तुन, करमा, आसन, पांदन, सिद्धा, ढेला, नीम, धाउरा, पियार, अमलतास, इमली (तेतर), बेल, पीपल, आदि महत्वपूर्ण हैं।

2. गौण उत्पाद

झारखण्ड में पाए जाने वाले गौण उत्पाद इस प्रकार हैं

(i) लाह (Lac or Shellac) : लाह उत्पादन की दृष्टि से झारखण्ड का देश में प्रथम स्थान है। यहाँ देश के कुल लाह उत्पादन का 50% होता है। झारखण्ड में ऐसे क्षेत्र बहुतायत में मिलते हैं, जो लाह उत्पादन की दृष्टि से सर्वथा अनुकूल है। इन क्षेत्रों में लाह उत्पादन के लिए उपयुक्त वातावरण (ऊँचाई-भू-भाग का समुद्र तल से 305 मीटर से अधिक ऊँचा होना, तापमान–12°C तक होना, वर्षा-150 cm से कम होना) मिलता है। लाह की 4 किस्में होती हैं—वैशाखी लाह, जेठवी लाह, कतकी लाह एवं अगहनी लाह। इनमें वैशाखी लाह सबसे महत्वपूर्ण है, क्योंकि झारखण्ड के कुल लाह उत्पादन का 82% लाह इसी वैशाखी लाह से प्राप्त होता है

(ii) केन्दु पत्ता (Kendu Leaves) : केन्दु पत्ता को गौण उत्पाद में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है क्योंकि यह झारखण्ड राज्य के राजस्व का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत है। केन्दु पत्ता से बीड़ी एवं तम्बाकू के मिश्रण बनाए जाते हैं।

(iii) तसर/मलबरी/रेशम (Tasar/Malberry/Silk) : तसर उत्पादन की दृष्टि से झारखण्ड का देश में प्रथम स्थान है। यहाँ देश के कुल तसर उत्पादन का 60% होता है। रेशम के उत्पादन में साल, अर्जुन, आसन, शहतूत आदि वृक्षों की आवश्यकता होती है, जो झारखण्ड के वनों में बहुतायत में मिलते हैं।

(iv) बाँस (Bamboo) : गौण उत्पाद में बाँस का अपना अलग महत्त्व है क्योंकि कई आदिवासी एवं अनुसूचित जातियाँ बाँस द्वारा खेती-गृहस्थी एवं घरेलू उपयोग के सामान तैयार कर सीधे बाजार में बेच कर जीविकोपार्जन करते हैं। व्यापारिक स्तर पर इसका उपयोग घर बनाने, कागज उद्योग एवं टेन्ट हाउस चलाने आदि में होता है।

(v) अन्य (Others) : अन्य गौण उत्पादों में साल बीज, महुआ बीज, महुआ पत्ता, चिरौंजी (पियार वृक्ष का बीज), इमली, आंवला, कत्था (खैर की लकड़ियों को खौलाकार उसके रस से बनाया जाने वाला), मधु, गोंद, घास, पत्तियाँ, छाल, बीज, फूल-फल, कंद-मूल, जड़ी-बूटियाँ आदि उल्लेखनीय हैं।

राष्ट्रीय उद्यान

झारखण्ड का एकमात्र राष्ट्रीय उद्यान बेतला राष्ट्रीय उद्यान (Betla National Park) है। इसकी स्थापना सितम्बर, 1986 ई. में की गई। लातेहार जिला में स्थित यह उद्यान 231.67 वर्ग किमी. में फैला हुआ है। यहाँ विश्व में पहली शेर गणना 1932 ई. में की गई थी। भारत सरकार 1973 ई. से यहाँ बाघ परियोजना (Tiger Project) चला रही है। इस राष्ट्रीय उद्यान में हाथी, बाघ, शेर, तेंदुआ, जंगली सूअर, चीतल, सांभर, गौर, चिंकारा, नीलगाय, भालू, बंदर, मोर, धनेश, वनमुर्गी आदि अनेक वन्य प्राणी देखे जा सकते हैं।

वन्य जीव अभ्यारण्य/आश्रयणी/शरण-स्थली

झारखण्ड में अभी तक कुल 11 वन्य जीव अभयारण्य स्थापित किए गए हैं, जिनका संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित तालिका में प्रस्तुत है—

क्र. अभ्यारण्य का नाम स्थापना क्षेत्रफल (वर्ग किमी. में) प्रमख वन्य जीव
1 पलामू अभ्यारण्य, पलामू 1976 794.33 हाथी, सांभर आदि
2 हजारीबाग अभ्यारण्य, हजारीबाग 1976 186.25 तेंदुआ, हिरण, सांभर आदि
3 महुआडांड़ भेड़िया अभ्यारण्य, लातेहार 1976 63.25 भेड़िया, हिरण आदि
4 दालमा अभ्यारण्य, पू. सिंहभूम 1976 193.22 हाथी, तेंदुआ, हिरण आदि
5 तोपचांची अभ्यारण्य, धनबाद 1976 8.75 तेंदुआ, हिरण, जंगली भालू आदि
6 लावालौंग अभ्यारण्य, चतरा 1978 207 बाघ, तेंदुआ, नीलगाय, हिरण, सांभर आदि
7 पारसनाथ अभ्यारण्य, गिरिडीह 1978 49.33 तेंदुआ, सांभर, हिरण, नीलगाय आदि
8 कोडरमा अभ्यारण्य, कोडरमा 1981 177.95 तेंदुआ, सांभर, हिरण आदि
9 पालकोट अभ्यारण्य, गुमला 1985 183.18 तेंदुआ, जंगली भालू आदि
10 उधवा झील पक्षी विहार, साहेबगंज 1990 5.65 बनकर, जलकौवा, बटान, खंजन, किंगफिशर आदि
11 राजमहल पक्षी विहार, साहेबगंज 6.65 कबूतर, चूंडूल, मधुमक्खी, बुलबुल, खंजन आदि
12 बेताल राष्ट्रीय उद्यान, पलामू 1986 223167 हाथी, गौर, चीतल, सांभर,नीलगाय
13 गौतम बुद्ध अभयारण्य, कोडरमा 176 121.142 कबूतर, मधुमक्खी , बुलबुल, खंजन

जैविक उद्यान

झारखण्ड क्षेत्र में स्थापित जैविक उद्यान इस प्रकार हैं

  1. बिरसा भगवान जैविक उद्यान, ओरमांझी (राँची): 1954 में स्थापित, राष्ट्रीय राजमार्ग 33 पर सपही नदी के तट पर स्थित।
  2. जवाहर लाल नेहरू जैविक उद्यान, सिटी पार्क (बोकारो) : पर्यटकों के सैर के लिए टॉय ट्रेन (Toy Train) की व्यवस्था है।
  3. मगर प्रजनन केन्द्र, रूक्का (राँची) : IUCN प्रोग्राम के तहत 1987 में स्थापित है।
  4. बिरसा मृग विहार, कालामाटी (राँची) : सांभर व चीतल के संरक्षण हेतु स्थापित।

वन्य प्राणी क्षेत्र संबंधी विविध तथ्य

(i) अभ्यारण्यों में केवल पलामू अभ्यारण्य राष्ट्रीय स्तर का है तथा शेष राज्य स्तरीय हैं।

(ii) दालमा वन्य जीव अभ्यारण्य में हाथी परियोजना (Project Elephant) की शुरुआत की गई है।

(iii) तोपचांची अभ्यारण्य के मध्य में स्थित झील का नाम ‘हरी पहाड़ी’ है। (iv) उधवा झील पक्षी विहार में जाड़े में प्रवासी पक्षी शरण लेने आते हैं।

(v) 26 सितम्बर, 2001 ई. को भारत सरकार द्वारा सिंहभूम जिला को देश के प्रथम गज आरक्ष्य (Elephant Reserve) के रूप में अधिसूचित किया गया।

(vi) झारखण्ड राज्य बनने के बाद साहेबगंज क्षेत्र में राजमहल की पहाड़ियों के इर्द-गिर्द नेचर क्लब द्वारा राजमहल जीवाश्म उद्यान (Rajmahal Fossils Park) विकसित किया गया है।

(vii) टाटा स्टील जन्तु उद्यान जमशेदपुर में स्थित है। (viii) नक्षत्र वन तथा सिद्धू-कान्हु पार्क राँची में हैं।

(ix) तिलैया पक्षी विहार कोडरमा में, तेनुघाट पक्षी विहार व चन्द्रपुरा पक्षी विहार बोकारो में तथा ईचागढ़ पक्षी विहार सरायकेला-खरसावां जिला में स्थित है।

पक्षी विहार

तिलैया पक्षी : विहार यह पक्षी विहार झारखण्ड प्रदेश के कोडरमा जिले में स्थित है। दामोदर घाटी परियोजना के अन्तर्गत बराकर नदी पर तिलैया बांध का निर्माण किया गया है। इस बांध क्षेत्र के अंतर्गत ही तिलैया पक्षी विहार का विकास किया गया है।

तेनुघाट पक्षी विहार : तेनुघाट बांध एशिया का सबसे बड़ा मिट्टी का बांध है। यह बोकारो जिले में स्थित है। ठंडे मौसम में अनेक तरह के पक्षियों का यहाँ आगमन होता है।

चंद्रपुरा पक्षी विहार, बोकारो : डी.वी.सी. का चंद्रपुरा स्थित जलाशय (Reservoir) जाड़े के मौसम में साइबेरियन पक्षियों में भर जाता है। लगभग डेढ़ किमी. क्षेत्र में फैले इस जलाशय में इन पक्षियों का झुंड मनोरम दृश्य उपस्थित करता है।

ईचागढ़ पक्षी विहार : यह पक्षी विहार स्वर्णरेखा परियोजना के डूब क्षेत्र में स्थित है। सरायकेला खरसांवां के ईचागढ़ और नीमडीह के क्षेत्र में स्थित यह विहार साइबेरियन पक्षियों का मनपसंद स्थल है। यहाँ प्रतिवर्ष काफी संख्या में साइबेरियन पक्षियों का आगमन होता है।

उधवा पक्षी विहार, साहेबगंज : साहेबगंज जिला के अंतर्गत यह पक्षी विहार 5.65 वर्ग किमी. क्षेत्र में फैला हुआ है। पक्षी विहार के रूप में उधवा को 1991 में मान्यता मिली।

झारखण्ड में मगरमच्छ केन्द्र : इसकी स्थापना राँची से 35 किमी. दूर ओरमांझी-सिक्कद्री रोड पर अवस्थित मुटा में की गई है। IUCN कार्यक्रम के अंतर्गत 1987 में स्थापित इस केंद्र का मुख्य उद्देश्य खतरे में पड़े जीव-जन्तुओं का संरक्षण है। आगंतुकों के लिए यहाँ वन विश्राम गृह, खान-पान एवं मनोरंजन की भी व्यवस्था है।

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By : Ramakant Verma

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