असहयोग आन्दोलन और झारखण्ड

असहयोग आन्दोलन के क्रम में भी झारखण्ड पूरी तरह आंदोलित रहा था, यहाँ के निवासियों ने इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। 1920-21 में गाँधीजी स्वयं यहाँ आए और राँची स्थित भीमराज बंशीधर मोदी धर्मशाला में रुके। इस धर्मशाला के सामने ही लंकाशयर-मैन्चेस्टर मिलों के विदेशी कपड़ों की होली जलाई गई। लोगों ने खादी पहनने का संकल्प लिया और चरखा चलाने लगे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह हुई कि गांधी जी का यहाँ ताना भगतों से संपर्क हुआ। वैष्णव ताना भगत दल के अनुयायी गांधी जी के शिष्य बनते गए। खादी बुनना और पहनना, पैसा-दो-पैसा, जो भी इनके पास था, गाँधीजी को समर्पित कर देना इनका धर्म बन गया। असहयोग आंदोलन के क्रम में इन लोगों ने ब्रिटिश सरकार को टैक्स देना बंद कर दिया। फलस्वरूप उनकी जमीन जब्त की ली गई। स्वयं गाँधी जी ने स्वीकार किया था कि उनके सारे शिष्यों में ताना भगत सर्वोत्कृष्ट थे।

छोटानागपुर में राँची असहयोग आंदोलन का प्रमुख केन्द्र था। इसके अतिरिक्त लोहरदगा, डोरंडा, सेन्हा, इटकी, घाघरा, ओरमांझी, कोकर, तमाड़, गुमला आदि में भी इस आंदोलन को सफल बनाने के लिए कई सभाएं हुई तथा इनमें गुलाब तिवारी, मौलवी उस्मान और स्वामी विश्वानंद इत्यादि नेताओं के भाषण हुए। नवम्बर, 1921 ई. में राँची में वार्षिक पिंजरापोल समारोह हुआ, जिसमें पद्मराज जैन, भोलानाथ वर्मन, मौलवी जकारिया, अब्दुल रज्जाक और सुंदर दत्त ने अपने विचार रखे। इन नेताओं के भाषण का मुख्य अंश था – असहयोग एवं मद्य निषेध। टहल ब्रह्मचारी, गुलाब तिवारी तथा मौलवी उस्मान आदि के प्रयासों सेआदिवासी भी काफी संख्या में इस आंदोलन में शामिल हुए। आदिवासी तो यह समझने लगे कि अंग्रेजों का राज समाप्त हो गया और गाँधीजी का राज्य कायम हो गया। 1923 के अप्रैल में राष्ट्रीय सप्ताह मनाया गया। राष्ट्रीय ध्वज को रक्षा के लिए जब नागपुर झण्डा-सत्याग्रह हुआ तो उसमें ताना भगत भी भारी संख्या में शामिल हुए। इस आंदोलन के क्रम में हजारीबाग में राजनीतिक क्रिया-कलापों का आरम्भ हुआ। यहाँ कई विद्यार्थियों ने पढ़ाई छोड़ दी और राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल हो गए। कुछ वकीलों ने अपनी वकालत छोड़ दी। असहयोग आंदोलन के दौरान हजारीबाग, चतरा, धनबाद तथा डाल्टेनगंज में ‘राष्ट्रीय स्कूलों (National Schools) की स्थापना हुई। हजारीबाग के प्रमुख नेताओं में बजरंग सहाय, कृष्ण बल्लभ सहाय, सरस्वती देवी, त्रिवेणी और शालिग्राम सिंह का नाम उल्लेखनीय है, जिन्हें असहयोग आंदोलन के क्रम में जेल की यात्रा करनी पड़ी। इस आंदोलन के दौरान छोटानागपुर में गाँधीजी के अतिरिक्त अन्य राष्ट्रीय नेताओं का भी आगमन हुआ। उनमें मुख्य रूप से डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, मजहरूल हक, मोतीलाल नेहरू तथा स्वामी विश्वानंद का नाम उल्लेखनीय है, जिन्होंने राँची, जमशेदपुर और हजारीबाग में अनेक स्थानों पर भाषण दिए। 1921 ई. में असहयोग आंदोलन के तहत कई स्थानों पर शराब को भट्टियों को तोड़ दिया गया या उन्हें जबरन बंद करा दिया गया। 1921 ई. में हजारीबाग में ‘बिहार स्टूडेंट्स कांफ्रेंस’ के 16वें अधिवेशन में सरकारी स्कूलों के बहिष्कार, विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार तथा स्वयंसेवक से संबद्ध प्रस्ताव पारित किए गए।

1922 ई. में चौरी-चौरा काण्ड के बाद गाँधीजी द्वारा असहयोग आंदोलन स्थगित कर दिया गया, जिससे कांग्रेस में विभाजन हो गया और स्वराज्य पार्टी की स्थापना हुई। 1923 ई. में जब प्रांतीय लेजिस्लेटिव काउंसिल बनी तो कृष्ण बल्लभ सहाय स्वराज्य पार्टी के प्रतिनिधि के रूप में चुने गए।

असहयोग आंदोलन के क्रम में सिंहभूम का क्षेत्र भी पूरी तरह आंदोलित रहा। सिंहभूम के चक्रधरपुर में एक ‘राष्ट्रीय विद्यालय’ खोला गया। जमशेदपुर स्थित गोलमुरी में लगभग चार दिनों तक सभाएं होती रहीं। इन सभाओं को काठियावाड़ निवासी हरिशंकर व्यास ने भी संबोधित किया। जमशेदपुर श्रमिक संघ के वी.जे. साठे ने इन सभाओं की अध्यक्षता की। बाल गंगाधर तिलक को प्रतिमा सहित यउन हॉल की स्थापना के लिए धन एकत्रित किया गया। 1924 ई. में सिंहभूमि के आदिवासियों ने हार-कर न देने का आंदोलन चलाया। फलतः इनके नेता विष्णु माहुरी को बंदी बना लिया गया। हार-कर आंदोलन के अन्य नेताओं में रसिका मानकी, सुखलाल हो, रैन्तु मुंडा, भगवान ग्वाला तथा दुबराज हो, चरण हो, सनातन तांती, होरा हो, जेना हो तथा जय भूमिज के नाम उल्लेखनीय हैं, जिन्हें बाद में पकड़ लिया गया।

1925 ई. में गाँधीजी झारखण्ड आए। वहाँ उन्होंने हजारीबाग स्थित संत कोलम्बस कॉलेज के छात्रों को संबोधित किया। यहां उन्हें एक मंजूषा के साथ 1300 रुपये की थैली भेंट की गई। अगस्त 1925 ई. में सी. एफ. एंड्ज के आग्रह पर गांधीजी जमशेदपुर पहुंचे तथा यहाँ दो दिन ठहरे। जे. आर. डी. टाटा ने गाँधीजी का भव्य स्वागत किया। अगले दिन जवाहरलाल नेहरू और राजेन्द्र प्रसाद भी टाटा नगर पहुंचे। 8 अगस्त, 1925 को जमशेदपुर के ‘इण्डियन एसोसिएशन’ (Indian Association) ने गाँधीजी के सम्मान में प्रीतिभोज दिया। जमशेदपुर की सभा में गाँधीजी को 5,000 रुपये देश बंधुस्मृति कोष के लिए दिए गए। यहाँ की महिलाओं ने भी एक सभा के पश्चात् गाँधीजी को नकदीऔर आभूषण दिए। जमशेदपुर के बाद गाँधीजी चाईबासा भी गए और लोगों को संबोधित किया। इसी काल में चाईबासा से एक पत्रिका ‘तरुण शक्ति’ का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ। इस पत्रिका के लेख ब्रिटिश विरोधी थे। अत: सरकार ने इसके सम्पादक आनन्द कमल चक्रवर्ती को बंदी बना लिया।

‘साइमन कमीशन’ के भारत आगमन पर पूरे देश में जिस बंग की प्रतिक्रिया हुई, उससे झारखण्ड प्रदेश भी अछूता नहीं रह सका। यहाँ इसके विरोध का मुख्य केन्द्र राँची था। पलामू के पाटन निवासी कोहड़ा पाण्डेय के नेतृत्व में साइमन कमीशन के विरुद्ध राँची में बहुत बड़ा प्रदर्शन हुआ।

असहयोग आन्दोलन और झारखण्ड से सम्बंधित प्रमुख तथ्य (for MCQs)

  • भारतीय स्वाधीनता आंदोलन का नेतृत्व जब महात्मा गांधी के हाथों में आया, तब उन्होंने झारखण्ड की भूमि का भी सहयोग लिया।
  • महात्मा गांधी के विभिन्न राजनीतिक आंदोलनों का प्रभाव झारखण्ड में बराबर पड़ता रहा।
  • 1917 ई. में श्याम कृष्ण सहाय ने गांधीजी को रांची आने का निमंत्रण दिया। महात्मा गांधी के चरण झारखण्ड की धरती पर 4 जून, 1917 को पड़े। इस दिन वे कांग्रेसी नेता ब्रजकिशोर बाबू के साथ रांची आये थे।
  • महात्मा गांधी मोतिहारी से चलकर रांची, बिहार, के ले. गवर्नर, एडवर्ट गेट से मिलने पहुंचे और श्याम कृष्ण सहाय के यहां ठहरे।
  • चंपारण आन्दोलन के स्वरूप का निर्णय गांधीजी ने रांची में ही किया। यहीं से वे चंपारण के लिए प्रस्थान किये।
  • झारखण्ड में महात्मा गांधी के बाद सक्रिय भूमिका निभाने वाले मौलाना अबुल कलाम आजाद को 1916 से 1919 तक रांची में नजरबंद रखा गया था।
  • अगस्त 1917 में मौलाना आजाद ने रांची में अंजुमन इस्लामिया और मदरसा इस्लामिया की नींव डाली। मौलाना आजाद ने अपना प्रसिद्ध प्रेस अलबेलाग प्रेस बेचकर उससे प्राप्त धनराशि को भी मदरसा में लगा दिया।
  • पलामू में 1919 ई. में बिन्देश्वरी पाठक तथा भागवत पांडेय के नेतृत्व में जिला कांग्रेस कमिटी की स्थापना हुई।
  • 10 अक्टूबर, 1920 ई. को डाल्टनगंज में बिहार स्टूडेंट कॉन्फ्रेंस का 15वां अधिवेशन सी.एफ. एण्डुयज की अध्यक्षता में हुआ। इसमें विद्यालयों एवं शिक्षण संस्थानों के बहिष्कार और असहयोग आंदोलन को तेज करने का फैसला लिया गया।
  • इस अधिवेशन में मजहर-उल-हक, चन्द्रवंशी सहाय, कृष्ण प्रसन्न सेन, अब्दुल बारी, जी. इमाम तथा हसर आरजू जैसे प्रमुख नेता शामिल हुए।
  • पलामू कांग्रेस के निर्णयानुसार डाल्टनगंज में राष्ट्रीय विद्यालय की स्थापना की गयी, जिसके प्रधानाध्यापक बिन्देश्वरी पाठक बनाये गये।
  • झारखण्ड के रांची, चतरा, गिरिडीह, झरिया, लोहरदगा में राष्ट्रीय विद्यालय खोले गये थे। कि ।
  • रांची तथा हजारीबाग में 1920 में कांग्रेस कमिटि का गठन किया गया। बिहार स्टूडेन्ट कॉन्फ्रेंस का 16वां अधिवेशन 6 अक्टूबर, 1921 को हजारीबाग में हुआ। इस अधिवेशन की अध्यक्षता श्रीमति सरला देवी ने की।
  • रांची में रौलेट एक्ट और जालियांवाला बाग हत्याकांड के खिलाफ आंदोलन का नेतृत्व गुलाब तिवारी ने किया।
  • 1920 में महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता की लड़ाई के क्रम में अहिंसक असहयोग आंदोलन प्रारंभ किया।
  • सम्पूर्ण झारखण्ड में देश के अन्य भागों की तरह असहयोग आंदोलन व्यापक रूप से प्रारंभ हुआ।
  • असहयोग आंदोलन के समय (1920-21 ई. में) गांधीजी स्वयं झारखण्ड आये और रांची में भीमराज वंशीधर मोदी धर्मशाला में ठहरे। इसी धर्मशाला के सामने लंकाशायर-मैन्चेस्टर मिलों के विदेशी कपड़ों की होली जलाई गई और लोगों ने खादी-वस्त्र धारण का व्रत लिया।
  • रांची, जमशेदपुर, डाल्टनगंज, हजारीबाग, धनबाद, देवघर, दुमका, गिरिडीह आदि नगर स्वदेशी वस्त्रों को अपनाने तथा विदेशी वस्तुओं को बहिष्कार करने का प्रमुख केन्द्र बना।
  • 1921 ई. में यह आंदोलन झारखण्ड में काफी तेज हो गया।
  • डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, मोतीलाल नेहरू, मजहरूल हक, स्वामी विश्वानंद, पं. हरिशंकर व्यास आदि नेताओं ने झारखण्ड के अनेक स्थानों का दौरा कर जनसभाओं को संबोधित किया।
  • गिरिडीह में असहयोग आंदोलन के सबसे प्रमुख नेता पचम्बा के बाबू बजरंग सहाय थे।
  • झारखण्ड में असहयोग आंदोलन का दीप जलाने में गुलाब तिवारी, भोलानाथ वर्मन, पद्मराज जैन, मौलवी उस्मान, अब्दुर रज्जाक और टाना भगतों का महत्वपूर्ण योगदान रहा।
  • असहयोग आंदोलन में झारखण्ड के टाना भगतों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। टाना भगतों ने गांधीजी के उपदेशों का अक्षरशः पालन किया। उन्होंने ब्रिटिश सरकार को भमि-कर देना बंद कर दिया।
  • असहयोग आंदोलन में झारखण्ड की पहाड़िया जनजाति के लोगों का महत्वपूर्ण योगदान रहा। इस आंदोलन में जबरा पहाड़िया ने हिस्सा लिया। पुलिस ने जबरा को गिरफ्तार कर लिया। उसे एक महीने का सश्रम कारावास की सजा दी गई तथा उसके घर की कुर्की भी गई।
  • सत्य और अहिंसा के प्रति आगाध निष्ठा के कारण गांधीजी को स्वीकार करना पड़ा कि उनके सारे शिष्यों में टाना भगत सर्वोत्तम थे।
  • जनवरी 1922 में साहेबगंज को अशांत क्षेत्र घोषित कर दिया गया।
  • 12 फरवरी, 1922 को चौरा-चौरी कांड के बाद असहयोग आंदोलन को वापस ले लिया गया।
  • झारखंड में राष्ट्रीय आन्दोलन का व्यापक विस्तार असहयोग आंदोलन के समय हुआ।
  • 1922 ई. में कांग्रेस में विभाजन, हो गया और स्वराज पार्टी की स्थापना हुई।
  • 1923 ई. में जब प्रांतीय लेजिस्लेटिव कौंसिल बनी, तो कृष्ण वल्लभ सहाय स्वराज पार्टी के प्रतिनिधि के रूप में चुने गए।

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By : Ramakant Verma

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